Highlights
- पाकिस्तान के सिंध और मुल्तान में मिली मंदिर की संपत्तियां।
- सुप्रीम कोर्ट की समिति ने राजस्थान के कोटा में 15 हेक्टेयर भूमि चिन्हित की।
- मुगल सम्राट अकबर और जयपुर के राजाओं ने भी किया था भूमि दान।
- जिलाधिकारियों के माध्यम से संपत्तियों के संरक्षण की कवायद शुरू।
मथुरा | विश्व प्रसिद्ध ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर की महिमा और संपत्तियां केवल भारत के विभिन्न राज्यों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी इनके प्रमाण मिले हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त प्रबंधन समिति की जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि पाकिस्तान के सिंध और मुल्तान जैसे क्षेत्रों में ठाकुर बांकेबिहारी जी के नाम पर अचल संपत्तियां दर्ज हैं। इस खुलासे के बाद अब इन ऐतिहासिक और धार्मिक संपत्तियों के संरक्षण की दिशा में प्रयास तेज कर दिए गए हैं।
समिति ने अपनी हालिया कार्रवाई के दौरान राजस्थान के कोटा जिले में मंदिर की करीब 15 हेक्टेयर भूमि को सफलतापूर्वक चिन्हित किया है। इस उपलब्धि ने देश के अन्य हिस्सों में फैली मंदिर की संपत्तियों को सुरक्षित करने की उम्मीद जगा दी है। समिति ने अब विभिन्न राज्यों के जिलाधिकारियों के साथ पत्राचार शुरू करने के निर्देश दिए हैं, ताकि मंदिर की सभी संपत्तियों की पहचान कर उन पर हो रहे अवैध कब्जों को हटाया जा सके और उन्हें मंदिर प्रबंधन के अधीन लाया जा सके।
ऐतिहासिक दानदाताओं में मुगल सम्राट भी शामिल
मंदिर के सेवायत प्रह्लादवल्लभ गोस्वामी के अनुसार, ठाकुर बांकेबिहारी के प्रति भक्तों की आस्था पीढ़ियों से चली आ रही है। मंदिर के पास मौजूद प्राचीन ग्रंथों और दस्तावेजों से पता चलता है कि केवल हिंदू राजा-महाराजा ही नहीं, बल्कि मुस्लिम शासकों ने भी बांकेबिहारी जी के चरणों में अपनी संपत्ति अर्पित की थी। ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, 1594 में मुगल सम्राट अकबर ने वृंदावन और राधाकुंड में 25 बीघा जमीन मंदिर को दान में दी थी। इसी प्रकार, 1592 में जयपुर के सवाई महाराजा मानसिंह ने लगभग 3 एकड़ भूमि दान की थी।
भक्तों की अटूट आस्था का प्रतीक
मंदिर की स्थापना के समय से ही दान की यह परंपरा निरंतर जारी है। भरतपुर के महाराजा ने अपने बगीचे को दान देकर इस पवित्र धाम की नींव रखने में सहयोग किया था। इसके अलावा, करौली सरकार, ग्वालियर रियासत और विंध्याचल राजपरिवार ने भी समय-समय पर भूमि, भवन और बहुमूल्य आभूषण मंदिर को भेंट किए हैं। वर्ष 1960 में राजस्थान के एक श्रद्धालु परिवार द्वारा कोटा में दान की गई 90 बीघा जमीन इसी अटूट आस्था का एक आधुनिक उदाहरण है।
संरक्षण के लिए कड़े कदम
सुप्रीम कोर्ट की समिति अब इन सभी संपत्तियों का एक डिजिटल डेटाबेस तैयार करने की योजना बना रही है। सेवायत गोस्वामी ने बताया कि किशोरपुरा क्षेत्र में भी एक श्रद्धालु द्वारा दान किया गया 500 वर्ग गज का भूखंड मंदिर के नाम दर्ज है। समिति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मंदिर की विरासत को किसी भी प्रकार की हानि न हो और भविष्य में इन संपत्तियों का उपयोग मंदिर के विकास और जन कल्याण के कार्यों में किया जा सके। पाकिस्तान स्थित संपत्तियों के मामले में अब कानूनी और कूटनीतिक रास्तों पर भी विचार किया जा सकता है।
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