नई दिल्ली | राज्यसभा सांसद नीरज डाँगी ने शून्यकाल के दौरान राजस्थान के माउंट आबू स्थित विश्व प्रसिद्ध देलवाड़ा जैन मंदिरों को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित करने की पुरजोर मांग की है। उन्होंने सदन में कहा कि 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच निर्मित ये मंदिर भारतीय प्राचीन स्थापत्य कला और अद्वितीय संगमरमर शिल्प के अनुपम उदाहरण हैं।
सांसद डाँगी ने बताया कि इन मंदिरों का निर्माण श्वेत संगमरमर से किया गया है, जिसकी नक्काशी और बारीक शिल्पकला प्रतिवर्ष लाखों पर्यटकों को आकर्षित करती है। विमलवसहि और लूणवसहि जैसे मंदिरों की कलात्मकता वैश्विक स्तर पर बेजोड़ है। उन्होंने जोर दिया कि ये मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र हैं, बल्कि भारत की बहुलतावादी संस्कृति, अहिंसा और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के जीवंत प्रतीक भी हैं।
श्री डाँगी ने सरकार से आग्रह किया कि इन ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय मान्यता सुनिश्चित करने के लिए इन्हें यूनेस्को की सूची में शामिल करने की प्रक्रिया प्राथमिकता से शुरू की जाए। इससे न केवल क्षेत्रीय पर्यटन और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि भावी पीढ़ियां भी भारत की गौरवशाली परंपरा से रूबरू हो सकेंगी।
देलवाड़ा जैन मंदिरों को मिले यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा: सांसद नीरज डाँगी ने देलवाड़ा जैन मंदिरों को यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित करने की मांग की
राज्यसभा सांसद नीरज डाँगी ने माउंट आबू के ऐतिहासिक देलवाड़ा जैन मंदिरों की अद्वितीय स्थापत्य कला के संरक्षण हेतु उन्हें यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित करने की मांग उठाई है।
HIGHLIGHTS
- सांसद नीरज डाँगी ने राज्यसभा में उठाया मुद्दा। देलवाड़ा मंदिरों को यूनेस्को दर्जा देने की मांग। 11वीं-13वीं शताब्दी की बेजोड़ शिल्पकला का हवाला।
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