गुरु शिखर से ब्रह्मांड की खोज: राजस्थान की सबसे ऊंची चोटी से ब्रह्मांड के रहस्य खोज रहे वैज्ञानिक: अब तक 6 ग्रह ढूंढे, अब दूसरी पृथ्वी की तलाश

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Highlights

  • गुरु शिखर पर स्थित फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी ने अब तक 6 नए एक्सोप्लैनेट की खोज की है।
  • वैज्ञानिक अब सुपर अर्थ की तलाश में जुटे हैं जहां पानी और हवा जैसे जीवन के तत्व मिल सकें।
  • एशिया का सबसे सटीक स्पेक्ट्रोग्राफ पारस-2 इसी वेधशाला में स्थापित है जो ग्रहों की सटीक गणना करता है।
  • वैज्ञानिकों को रिसर्च के दौरान जंगली जानवरों और लाइट पॉल्यूशन जैसी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

माउंट आबू | राजस्थान की सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर आज केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है बल्कि यह ब्रह्मांड के अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने का एक बड़ा केंद्र बन चुका है। यहां स्थित फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी यानी PRL के वैज्ञानिक दिन-रात तारों की दुनिया में झांक रहे हैं। पिछले नौ वर्षों में यहां के वैज्ञानिकों ने छह नए ग्रहों की खोज की है जो हमारे सौरमंडल से बाहर स्थित हैं। इन ग्रहों को एक्सोप्लैनेट कहा जाता है और इनमें से कुछ तो इतने विशाल हैं कि हमारी पृथ्वी उनके सामने एक छोटे दाने जैसी नजर आती है। अब वैज्ञानिकों का अगला लक्ष्य एक ऐसी सुपर अर्थ को ढूंढना है जहां इंसान के रहने लायक परिस्थितियां मौजूद हों। अरावली की पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसा यह स्थान अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत का नाम पूरी दुनिया में रोशन कर रहा है।

गुरु शिखर पर स्थापित ब्रह्मांड की खिड़की

अरावली की सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर तक पहुंचने के लिए आबू रोड से पहाड़ियों के घुमावदार रास्तों से होकर 18 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। इसी शिखर पर सफेद रंग की गुंबद के आकार वाली इमारतें स्थित हैं जिन्हें फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी कहा जाता है। स्थानीय लोग इसे प्यार से तारामंडल के नाम से भी बुलाते हैं। यहां कुल पांच सफेद डोम बनाए गए हैं जिनके भीतर आधुनिक दूरबीनें और वैज्ञानिक उपकरण लगे हैं। ये प्रयोगशालाएं अलग-अलग पहाड़ियों पर फैली हुई हैं ताकि हर दिशा से अंतरिक्ष का अवलोकन किया जा सके।

इन प्रयोगशालाओं में इंफ्रारेड और ऑप्टिकल तकनीक पर आधारित दूरबीनें लगाई गई हैं। इनमें से दो दूरबीनें छोटी हैं जबकि तीन काफी विशाल हैं। इनका मुख्य कार्य दूर स्थित तारों और ग्रहों की गति पर नजर रखना है। जब भास्कर की टीम इस लैब में पहुंची तो उस समय आसमान में बादल छाए हुए थे जिसके कारण दूरबीनें काम नहीं कर पा रही थीं। लेकिन लैब के भीतर वैज्ञानिकों की टीम पहले से प्राप्त डेटा का विश्लेषण करने में व्यस्त थी। यहां साइट प्रभारी प्रोफेसर सुनील चंद्रा अपनी टीम के साथ लगातार नई खोजों पर चर्चा कर रहे थे।

ऊंचाई पर वेधशाला बनाने का वैज्ञानिक कारण

प्रोफेसर सुनील चंद्रा ने बताया कि इस स्टेशन की स्थापना 1980 के दशक में अंतरिक्ष विभाग के एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट के रूप में की गई थी। इसे इतनी ऊंचाई पर स्थापित करने के पीछे ठोस वैज्ञानिक तर्क हैं। समुद्र तल से लगभग 5500 फीट की ऊंचाई पर होने के कारण यहां का वातावरण काफी स्थिर रहता है। ऊंचाई पर होने की वजह से वायुमंडल में धूल के कण और नमी बहुत कम होती है जिससे आसमान बिल्कुल साफ दिखाई देता है।

साफ आसमान और कम प्रदूषण के कारण टेलीस्कोप के जरिए करोड़ों मील दूर स्थित तारों और ग्रहों की स्पष्ट तस्वीरें लेना आसान हो जाता है। यहां से वैज्ञानिक सौरमंडल में जन्म लेते नए सितारों और आकाशगंगाओं में होने वाले विस्फोटों को बिना किसी बाधा के देख सकते हैं। यह स्थान खगोलीय अनुसंधान के लिए पूरे भारत में सबसे उपयुक्त माना जाता है। यही कारण है कि यहां से होने वाली खोजें वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त करती हैं।

एक्सोप्लैनेट की खोज और पारस उपकरण का कमाल

पिछले नौ वर्षों में इस वेधशाला ने अंतरिक्ष विज्ञान में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। 2016 में पारस उपकरण के विकसित होने के बाद प्रोफेसर अभिजीत चक्रवर्ती और उनकी टीम ने रेडियल वेलोसिटी तकनीक का उपयोग करते हुए छह नए एक्सोप्लैनेट की खोज की है। एक्सोप्लैनेट उन ग्रहों को कहा जाता है जो हमारे सूर्य के बजाय किसी दूसरे तारे की परिक्रमा करते हैं। हाल ही में खोजा गया एक्सोप्लैनेट TOI-6038A b विज्ञान की दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है।

यह ग्रह इतना विशाल है कि इसमें हमारी पांच पृथ्वियां समा सकती हैं। वेधशाला में मौजूद 2.5 मीटर और 1.2 मीटर की दूरबीनें भारत की सबसे भरोसेमंद खगोलीय दूरबीनों में गिनी जाती हैं। पारस-2 नामक उपकरण पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर आधारित है जिसे भारतीय वैज्ञानिकों ने बेल्जियम की कंपनी अमोस के सहयोग से तैयार किया है। यह उपकरण तारों से आने वाली रोशनी का विश्लेषण कर वहां मौजूद रासायनिक तत्वों की जानकारी देता है।

धूमकेतु की खोज और वैश्विक सराहना

प्रोफेसर सुनील चंद्रा ने एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि का जिक्र करते हुए बताया कि 2025 में चर्चित धूमकेतु 3I/ATLAS की सटीक गणना इसी वेधशाला की 1.2 मीटर दूरबीन से की गई थी। इस खोज की सराहना नासा और दुनिया भर की प्रमुख रिसर्च लैब ने की थी। यह धूमकेतु वर्तमान में हमारे सौरमंडल से बाहर की ओर जा रहा है और वैज्ञानिकों का अनुमान है कि फरवरी के पहले सप्ताह तक यह पूरी तरह से ओझल हो जाएगा।

वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसे धूमकेतुओं का अध्ययन हमें ब्रह्मांड की उत्पत्ति और सौरमंडल के विकास को समझने में मदद करता है। गुरु शिखर की दूरबीनें इन खगोलीय पिंडों की गति और उनके पथ की सटीक जानकारी प्रदान करती हैं। यह डेटा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंतरिक्ष अनुसंधान में उपयोग किया जाता है जिससे वैश्विक स्तर पर भारतीय वैज्ञानिकों की धाक जमती है।

आधुनिक 2.5 मीटर दूरबीन की विशेषताएं

इस वेधशाला की सबसे बड़ी शान 2.5 मीटर की आधुनिक दूरबीन है जिसे साल 2022 में स्थापित किया गया था। यह दूरबीन एक विशाल गुंबद के नीचे सुरक्षित रखी गई है और इसे कंप्यूटर के जरिए नियंत्रित किया जाता है। इसी दूरबीन की मदद से पिछले साल एक्सोप्लैनेट TOI-6038A b की खोज संभव हो पाई थी। यह ग्रह एक सब-सैटर्न श्रेणी का ग्रह है जो अंतरिक्ष की गहराइयों में स्थित है।

इससे पहले इसी तकनीक का उपयोग करते हुए TOI-6651b की खोज की गई थी जो एक उप-दानव तारे की परिक्रमा कर रहा है। इन खोजों ने साबित कर दिया है कि भारतीय तकनीक और वैज्ञानिक किसी भी विकसित देश से पीछे नहीं हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह दूरबीन इतनी शक्तिशाली है कि यह बहुत ही कम रोशनी वाले पिंडों को भी आसानी से पहचान सकती है।

पारस-2: एशिया का सबसे सटीक स्पेक्ट्रोग्राफ

वेधशाला में लगा पारस-2 स्पेक्ट्रोग्राफ एशिया महाद्वीप का सबसे हाई-रिजॉल्यूशन उपकरण है। यह उपकरण तारों और ग्रहों से आने वाली रोशनी को रंगों के विभिन्न हिस्सों में विभाजित कर देता है। जैसे हम इंद्रधनुष में सात रंग देखते हैं वैसे ही यह उपकरण रोशनी का अध्ययन कर यह बताता है कि वहां कौन से रासायनिक तत्व मौजूद हैं। इससे यह पता चलता है कि किसी ग्रह पर ऑक्सीजन, हाइड्रोजन या पानी की संभावना है या नहीं।

टीम अब इस स्पेक्ट्रोग्राफ की संवेदनशीलता को और बढ़ाने पर काम कर रही है ताकि पृथ्वी के समान छोटे और चट्टानी ग्रहों की खोज की जा सके। वैज्ञानिकों का मुख्य लक्ष्य अब सब-नेप्च्यून और सुपर-अर्थ जैसे ग्रहों पर है। सुपर-अर्थ वे ग्रह होते हैं जो पृथ्वी से बड़े होते हैं लेकिन उनकी संरचना चट्टानी होती है और वे अपने तारे से उचित दूरी पर होते हैं जिससे वहां जीवन की संभावना अधिक होती है।

वैज्ञानिकों की दिनचर्या और कठिन चुनौतियां

गुरु शिखर पर काम करना किसी चुनौती से कम नहीं है। वैज्ञानिकों को न केवल जटिल गणनाओं से जूझना पड़ता है बल्कि उन्हें जंगली जानवरों का भी सामना करना पड़ता है। इस इलाके में भालू, लेपर्ड, अजगर और लकड़बग्घे अक्सर प्रयोगशाला के आसपास घूमते देखे जाते हैं। सुरक्षा के लिहाज से सूरज ढलते ही सभी दरवाजे और खिड़कियां बंद कर ली जाती हैं। रात के समय जब दूरबीनें खोली जाती हैं तो वैज्ञानिकों को अत्यधिक सतर्क रहना पड़ता है।

दिसंबर और जनवरी के महीनों में यहां कड़ाके की ठंड पड़ती है और तापमान शून्य से नीचे चला जाता है। ऊंचाई पर होने के कारण हवाएं भी बहुत तेज चलती हैं। मानसून के चार महीनों के दौरान यह लैब बंद रहती है क्योंकि बादलों और बारिश के कारण अवलोकन संभव नहीं होता। साल भर में वैज्ञानिकों को केवल 220 रातें ही मिलती हैं जिनमें वे अपना शोध कार्य कर सकते हैं।

लाइट पॉल्यूशन की बढ़ती समस्या

अंतरिक्ष अनुसंधान में एक और बड़ी बाधा लाइट पॉल्यूशन यानी प्रकाश प्रदूषण है। आसपास के शहरों और गांवों में रात के समय जलने वाली तेज रोशनी के कारण अंतरिक्ष से आने वाले कमजोर सिग्नल प्रभावित होते हैं। दूरबीन के सेंसर तक पहुंचने वाला डेटा अनचाही रोशनी के कारण खराब हो जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि सटीक रीडिंग के लिए पूरी तरह से अंधेरी और रोशनी रहित रातें बहुत जरूरी हैं।

इस समस्या से निपटने के लिए वैज्ञानिक लगातार प्रयास कर रहे हैं और स्थानीय प्रशासन से भी सहयोग की उम्मीद रखते हैं। प्रकाश प्रदूषण के कारण इंफ्रारेड किरणों की सटीकता कम हो जाती है जिससे ग्रहों की खोज में बाधा आती है। इसके बावजूद भारतीय वैज्ञानिक सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों में भी अपनी खोज जारी रखे हुए हैं।

भविष्य की योजनाएं: रोबोटिक टेलीस्कोप और AI

आने वाले समय में इस वेधशाला को और भी आधुनिक बनाने की योजना है। साल 2028 तक कुछ दूरबीनों को पूरी तरह से रोबोटिक बनाने का लक्ष्य रखा गया है। रोबोटिक होने के बाद ये दूरबीनें बिना मानवीय हस्तक्षेप के सटीक आंकड़े एकत्र कर सकेंगी। इसके अलावा भविष्य में डेटा विश्लेषण के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का भी उपयोग किया जाएगा।

PRL अहमदाबाद में स्थित सुपरकंप्यूटिंग सुविधा विक्रम-1000 का उपयोग पहले से ही जटिल सिमुलेशन और मॉडलिंग के लिए किया जा रहा है। वर्तमान में इस वेधशाला में एक फैकल्टी सदस्य, पांच इंजीनियर और कई सहायक कर्मचारी दिन-रात काम कर रहे हैं। इनका एकमात्र उद्देश्य ब्रह्मांड के उस रहस्य को खोजना है जो अभी तक दुनिया की नजरों से छिपा हुआ है।

सुपर अर्थ की तलाश और जीवन की उम्मीद

वैज्ञानिकों का अब पूरा ध्यान ऐसी धरती को खोजने पर है जहां पानी और हवा मौजूद हो। अगर हमें कोई ऐसा ग्रह मिलता है जो अपने तारे से हैबिटेबल जोन में स्थित है तो वहां जीवन की संभावना प्रबल हो जाती है। माउंट आबू की यह वेधशाला इसी दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो रही है। यहां के वैज्ञानिकों को विश्वास है कि जल्द ही वे एक ऐसी सुपर अर्थ की खोज कर लेंगे जो भविष्य में मानव जाति के लिए नई उम्मीदें लेकर आएगी।

इस पूरी प्रक्रिया में डेटा विश्लेषण सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। दूरबीन संचालक आसिफ मोहम्मद और मैकेनिकल इंजीनियर विवेक मिश्रा जैसे विशेषज्ञ यह सुनिश्चित करते हैं कि तकनीकी खामियों के कारण एक भी पल व्यर्थ न जाए। दूरबीनों के दर्पणों की चमक बनाए रखने के लिए उनकी लगातार निगरानी की जाती है। राजस्थान की इस धरती से शुरू हुआ यह सफर अब अंतरिक्ष की अनंत गहराइयों तक पहुंच चुका है और आने वाले साल भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान के लिए क्रांतिकारी साबित हो सकते हैं।

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