Highlights
- क्या पुतिन की यात्रा सिर्फ भारत के 'खरीदार' होने का प्रमाण थी?
- रूस अब चीन का मोहरा है, भारत का दोस्त नहीं – समझिए क्यों!
- ट्रंप को पुतिन कार्ड से डराने का भ्रम और अमेरिका का भारत पर शिकंजा।
- चीन की बढ़ती धाक और भारत का तीनों महाशक्तियों के लिए 'कैप्टिव बाजार' होना।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वैश्विक मंचों पर 'गले-मिलन' का अंदाज तो हम सबने देखा है। कभी पुतिन से, कभी ट्रंप से और कभी शी जिनपिंग से। देखने में लगता है कि भारत की कूटनीति अब नई ऊंचाइयों को छू रही है, बड़े-बड़े फैसले हो रहे हैं, भू-राजनीति में हमारा सिक्का जम रहा है।
लेकिन क्या वाकई ऐसा है, या हम कुछ बड़े भ्रम में जी रहे हैं? दिसंबर में पुतिन से गर्मजोशी, जनवरी में शायद ट्रंप से मुलाकात और फिर शी जिनपिंग से 'मधुर' संबंध... ये सब भारत की 'नियति' है, लेकिन किस नियति की बात हो रही है, यह समझना जरूरी है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इन सब 'गले-मिलन' के पीछे सिर्फ एक ही सच छुपा है: भारत एक बड़ा, खुला और मनचाहे दाम पर बिकने वाला 'बाजार' है!
आप कहेंगे, अरे नहीं! पुतिन की यात्रा से तो भारत-रूस के सामरिक रिश्ते मजबूत हुए हैं, भू-राजनीति में भारत का कद बढ़ा है, वगैरह-वगैरह। हमारे 'ज्ञानी' कूटनीतिज्ञ, विशेषज्ञ और टीवी एंकर तो यही बता रहे थे। लेकिन जरा ठंडे दिमाग से सोचिए, क्या सच में? पुतिन से भारत ने सिर्फ 'खरीदा' है। और रूस के लिए भारत सिर्फ 'कमाई का बाजार' है।
वही बाजार, जहां चीन के घटिया उत्पाद भी बिकते हैं और रूस के दोयम दर्जे के हथियार भी 'आवश्यकता' बन जाते हैं। अमेरिकी सोशल मीडिया से लेकर मैकडोनाल्ड, केएफसी, पेप्सी, कोक तक, सब हमारे गरीब, मध्यम वर्ग और अमीर भारतीयों की 'भूख' हैं। तो फिर भू-राजनीति में किस करवट की बात कर रहे हैं हम?
रूस: पुराना दोस्त या नया दुकानदार?
वह जमाना अलग था, जब सोवियत संघ और चीन में ठनी रहती थी, सीमा पर तनाव था। तब भी (1962 में चीन के हमले के समय), सोवियत संघ, यानी रूस, भारत की मदद को नहीं दौड़ा था। तब ब्रिटेन और अमेरिका से ही इमरजेंसी सप्लाई मिली थी।
सोवियत संघ के बिखराव के बाद का रूस, अब पुतिन के राज में और यूक्रेन युद्ध के चलते, चीन का मोहरा भर है। तो कल्पना कीजिए, अगर चीन ने अरुणाचल प्रदेश को हड़पने की सैनिक कार्रवाई की, तो क्या पुतिन भारत की मदद में दौड़ेंगे? जवाब सीधा है: नहीं।
आप पूरे दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को देखिए। पाकिस्तान हो या बांग्लादेश, नेपाल हो या श्रीलंका, हर जगह चीन की बिसात बिछी है और उसमें रूस, भारत का नहीं बल्कि चीन का प्यादा है और रहेगा। यह एक कड़वी सच्चाई है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।
लेकिन हाँ, पश्चिमी दुनिया में अछूत बने रूस के लिए भारत की उपयोगिता बहुत भारी है। भारत उससे तेल खरीदता है, हथियार खरीदता है, और इस व्यापार में रूस को सिर्फ मुनाफा ही मुनाफा है। साथ ही, भारत 'एहसान' मानते हुए वैश्विक मंचों, जैसे संयुक्त राष्ट्र, में रूस को लेकर तटस्थ या समर्थक बना रहता है। तभी तो भारत-रूस की दोस्ती न केवल 'पुरानी', बल्कि 'टिकाऊ' भी है – क्योंकि यह बाजार के मजबूत धागों से बंधी है!
ट्रंप का टैरिफ शिकंजा: बाजार और 'धमकी'
अब बात करते हैं अमेरिका की। राष्ट्रपति ट्रंप इन दिनों भारत के बाजार को अपनी शर्तों में ढलवाने के लिए उस पर टैरिफ का शिकंजा कसे हुए हैं। एक तथ्य यह भी है कि रूस और चीन भारत के बाजार में बेइंतहां मुनाफा कमाते हैं, वहीं अमेरिका हमेशा से घाटे में रहा है। उसकी यह स्थिति चीन के साथ व्यापार में भी थी, लेकिन चीन को अमेरिका झुका नहीं सका।
तभी ट्रंप ने चीन से समझौता कर लिया। लेकिन वे भारत को झुकाने पर आमादा हैं। यह फालतू बात है कि भारत के 'पुतिन कार्ड' से ट्रंप घबराएंगे। मेरा मानना है कि जनवरी-फरवरी में मोदी सरकार ट्रंप प्रशासन के साथ करार कर लेगी। और शायद यह हेडलाइन बनवाई जाएगी कि 'प्रधानमंत्री मोदी ने पुतिन के साथ कूटनीति से ट्रंप प्रशासन को मजबूर किया।' जबकि असलियत में ट्रंप का पुतिन से पुराना याराना और साठगांठ है। यह सब सिर्फ दिखावा है, पर्दे के पीछे कुछ और ही चल रहा है।
चीन: असली विजेता और भारत का 'कैप्टिव बाजार'
इन सबमें सर्वाधिक फायदे में कौन है? चीन और शी जिनपिंग! कोई माने या न माने, लेकिन कूटनीतिक, भू-राजनीतिक और व्यापारिक पैमानों पर सन् 2025 का वर्ष इतिहास में चीन के अमेरिका के बराबर आ खड़े होने के ऐतिहासिक वर्ष के रूप में दर्ज होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी 'मूर्खताओं' में चीन को बराबरी की महाशक्ति बना दिया है। और जरा सोचिए, चीन की इस नई वैश्विक क्षत्रपता में रूस क्या है? उसका एक मोहरा। और भारत क्या है? भारत, इन तीनों महाशक्तियों – चीन, रूस और अमेरिका – का एक 'कैप्टिव बाजार'! क्या नहीं?
तो अगली बार जब आप किसी वैश्विक नेता के 'गले-मिलन' की खबर देखें, तो सिर्फ कूटनीति के चश्मे से मत देखिए। जरा बाजार के गणित को भी समझिए। शायद तब आपको यह तस्वीर ज्यादा साफ नजर आएगी कि हम सिर्फ एक बड़े बाजार से ज्यादा कुछ नहीं हैं, जिसे महाशक्तियाँ अपनी शर्तों पर भुनाना चाहती हैं। यह सोचने वाली बात है, क्या हम इस कड़वी सच्चाई को स्वीकारने को तैयार हैं?
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