सिरोही में खनन परियोजना के खिलाफ ग्रामीणों का भारी आक्रोश: खनन परियोजना के विरोध में BNSS नोटिस से मचा बवाल, ग्रामीणों ने आंदोलन दबाने का लगाया आरोप

खनन परियोजना के विरोध में BNSS नोटिस से मचा बवाल, ग्रामीणों ने आंदोलन दबाने का लगाया आरोप
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प्रशासन ने 50 से अधिक ग्रामीणों को जारी किए BNSS के नोटिस। 28 जनवरी के आंदोलन को दबाने की साजिश का आरोप। पिण्डवाड़ा कोर्ट में वकीलों ने शांतिपूर्ण विरोध को मौलिक अधिकार बताया। जल जंगल और जमीन की रक्षा के लिए ग्रामीणों का संघर्ष जारी।

सिरोही/पिण्डवाड़ा। कमलेश मेटा कास्ट की प्रस्तावित खनन परियोजना के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे ग्रामीणों पर प्रशासन द्वारा BNSS की धारा 126 व 135(3) के तहत नोटिस जारी किए जाने से पूरे क्षेत्र में जबरदस्त आक्रोश फैल गया है। वाटेरा, भीमाना, भारजा और रोहिड़ा क्षेत्र के 50 से अधिक ग्रामीणों को मिले नोटिसों को जनता ने सीधे तौर पर आंदोलन को दबाने की कोशिश बताया है।


28 जनवरी के आंदोलन से पहले दबाव बनाने का आरोप
ग्रामीणों का कहना है कि 28 जनवरी को प्रस्तावित बड़े आंदोलन से पहले प्रशासन ने डर का माहौल बनाने के लिए यह कदम उठाया है।
क्षेत्रवासियों का आरोप है कि लोकतांत्रिक व संवैधानिक तरीके से अपनी बात रखने वालों को नोटिस देकर सरकार और प्रशासन
जनभावनाओं को कुचलने का प्रयास कर रहे हैं।

गांव-गांव में नाराजगी, लामबंदी और तेज

नोटिस जारी होने के बाद गांवों में बैठकों का दौर तेज हो गया है। लोग एकजुट होकर परियोजना निरस्तीकरण की मांग पर अडिग हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह परियोजना जल, जंगल और जमीन के लिए खतरा है, जिससे पशुपालन, खेती और पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ेगा।

आज पिण्डवाड़ा कोर्ट में बड़ी सुनवाई

BNSS की धारा 126 व 135(3) के तहत जारी नोटिसों पर आज पिण्डवाड़ा कोर्ट में एक साथ बड़ी सुनवाई हुई। माननीय कार्यपालक मजिस्ट्रेट पिण्डवाड़ा के समक्ष दर्जनों ग्रामीणों की पेशी हुई। कोर्ट परिसर में सुबह से ही भारी संख्या में समर्थक और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।

एडवोकेट तुषार पुरोहित व हार्दिक रावल ने रखा मजबूत पक्ष

ग्रामीणों की ओर से एडवोकेट तुषार पुरोहित और एडवोकेट हार्दिक रावल ने मजबूती से पक्ष रखा। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के कई ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि शांतिपूर्ण आंदोलन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है और इसे दबाना असंवैधानिक है।

नोटिस को जन-अधिकारों के खिलाफ बताया

वकीलों ने दलील दी कि धारा 126 व 135(3) का उपयोग केवल वास्तविक और तात्कालिक खतरे की स्थिति में किया जा सकता है, न कि शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक आंदोलन को रोकने के लिए। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक कार्रवाई जन-अधिकारों के खिलाफ है और इसमें शक्ति का दुरुपयोग किया गया है।

कोर्ट में गंभीर बहस, प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल

सुनवाई के दौरान कोर्ट में कानूनी बिंदुओं पर गंभीर बहस हुई। ग्रामीणों के अधिवक्ताओं ने प्रशासनिक कार्रवाई की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि बिना किसी हिंसा या अव्यवस्था के संकेत के नोटिस जारी करना न्यायसंगत नहीं है।


जनभावनाओं की अनदेखी का मुद्दा प्रमुखता से उठा


कोर्ट में यह मुद्दा भी प्रमुखता से उठा कि प्रशासन ने जनभावनाओं की पूरी तरह अनदेखी की है। ग्रामीणों का कहना है कि वे केवल अपनी आजीविका और पर्यावरण की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

फैसले पर टिकी निगाहें, आंदोलन और तेज होने के संकेत

अब सभी की निगाहें माननीय मजिस्ट्रेट के फैसले पर टिकी हैं। उधर, क्षेत्र में आंदोलन और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं। जनसमर्थन लगातार बढ़ रहा है और ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि वे कानूनी व संवैधानिक दायरे में रहकर अपना संघर्ष जारी रखेंगे।

सरकार के प्रति लोगों में भारी असंतोष

वाटेरा, भीमाना, भारजा, रोहिड़ा ग्राम पंचायत क्षेत्र के लोगों में सरकार के प्रति भारी आक्रोश है। इस तरह राजनीति दबाव में कार्रवाई के आरोप भी लोगों द्वारा लगाया जा रहें है। इस तरह कि कार्रवाई का खामियाजा आने वाने वाले समय में सरकार कों भुगतान पड सकता है क्योंकि आम लोग इस कार्रवाई से खासे नाराज है। 

रिपोर्ट : 
तुषार पुरोहित सिरोही

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