Highlights
- चीन में AI टूल ने बिना किसी लक्षण वाले पैंक्रियाज कैंसर की शुरुआती पहचान की।
- अलीबाबा की डामो अकादमी द्वारा विकसित पांडा टूल ने 93 प्रतिशत सटीकता दिखाई।
- पैंक्रियाज कैंसर से होने वाली 90 प्रतिशत मौतों को रोकने में यह तकनीक मददगार हो सकती है।
- अमेरिकी स्वास्थ्य नियामक संस्था FDA ने इस तकनीक को ब्रेकथ्रू डिवाइस का दर्जा दिया है।
बीजिंग | चीन में तकनीक और चिकित्सा विज्ञान के संगम ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है जो आने वाले समय में कैंसर के इलाज की दिशा बदल सकती है। चीन के एक 57 वर्षीय मजदूर किउ सिजुन के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस किसी फरिश्ते से कम साबित नहीं हुआ। सिजुन अपनी नियमित डायबिटीज की जांच कराने अस्पताल गए थे, लेकिन वहां AI की टेस्टिंग ने उनकी जिंदगी बचा ली। जांच के तीन दिन बाद जब डॉक्टर का फोन आया, तो सिजुन को किसी अनहोनी का डर सताने लगा था। उनकी शंका सही निकली लेकिन परिणाम सुखद रहा क्योंकि उनके पैंक्रियाज यानी अग्नाशय में कैंसर का पता बहुत ही शुरुआती चरण में चल गया था।
पैंक्रियाज कैंसर को दुनिया के सबसे घातक रोगों में गिना जाता है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके लक्षण तब तक प्रकट नहीं होते जब तक कि बीमारी अंतिम चरणों में न पहुंच जाए। Apple के पूर्व CEO स्टीव जॉब्स की मृत्यु भी इसी गंभीर बीमारी के कारण हुई थी। आंकड़े बताते हैं कि इस कैंसर से पीड़ित केवल 10 प्रतिशत मरीज ही पांच साल से अधिक जीवित रह पाते हैं। इसका मुख्य कारण शुरुआती पहचान का न हो पाना है। लेकिन सिजुन के मामले में अस्पताल में चल रहे AI ट्रायल ने वह कर दिखाया जो सामान्य स्कैन में अक्सर संभव नहीं हो पाता। डॉक्टरों ने तुरंत ऑपरेशन कर ट्यूमर को शरीर से बाहर निकाल दिया और अब सिजुन पूरी तरह स्वस्थ हैं।
कैसे काम करता है पांडा AI टूल
इस चमत्कारिक पहचान के पीछे अलीबाबा की डामो अकादमी के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित पांडा टूल का हाथ है। पांडा का पूरा नाम पैंक्रियाटिक कैंसर डिटेक्शन विद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है। सामान्य तौर पर पैंक्रियाज कैंसर की पहचान के लिए कॉन्ट्रास्ट सीटी स्कैन की आवश्यकता होती है, जिसमें मरीज को एक विशेष तरल पिलाया जाता है और इसमें रेडिएशन का स्तर भी बहुत अधिक होता है। इस कारण डॉक्टर हर किसी को इसकी सलाह नहीं देते। वहीं दूसरी ओर नॉन-कॉन्ट्रास्ट सीटी स्कैन में रेडिएशन कम होता है लेकिन इसमें ट्यूमर के छोटे लक्षणों को पहचानना रेडियोलॉजिस्ट के लिए लगभग नामुमकिन होता है।
पांडा तकनीक इसी मुश्किल को हल करती है। वैज्ञानिकों ने हजारों पुराने सीटी स्कैन का बारीकी से अध्ययन किया और AI को प्रशिक्षित किया कि वह धुंधली या कम स्पष्ट तस्वीरों में भी कैंसर के सूक्ष्म पैटर्न को पहचान सके। यह टूल उन बदलावों को देख सकता है जिन्हें इंसानी आंखें सामान्य स्क्रीनिंग के दौरान नजरअंदाज कर देती हैं। इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह नियमित स्वास्थ्य जांच के दौरान लिए गए सामान्य सीटी स्कैन डेटा का उपयोग करके भी कैंसर की चेतावनी दे सकती है।
क्लिनिकल ट्रायल और सफलता की दर
चीन के निंगबो यूनिवर्सिटी से जुड़े पीपुल्स हॉस्पिटल में नवंबर 2024 से इस तकनीक का बड़े पैमाने पर क्लिनिकल ट्रायल चल रहा है। अब तक इस सिस्टम ने लगभग 1 लाख 80 हजार से अधिक पेट और सीने के सीटी स्कैन का विश्लेषण किया है। इस विस्तृत जांच के दौरान AI ने लगभग 24 ऐसे मामले पकड़े जो कैंसर के थे और इनमें से 14 मामले बहुत ही शुरुआती स्टेज के थे। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कई मरीज अस्पताल में केवल पेट फूलने या मतली जैसी सामान्य शिकायतों के साथ आए थे और उन्हें पैंक्रियाज की बीमारी का कोई अंदेशा नहीं था।
रिसर्च के अनुसार पांडा सिस्टम ने 93 प्रतिशत मामलों में बिल्कुल सटीक जानकारी दी है। यह तकनीक न केवल कैंसर की मौजूदगी बताती है बल्कि यह भी स्पष्ट करती है कि ट्यूमर कितना घातक हो सकता है। टूल ने कई ऐसे मरीजों में इंट्राडक्टल एडेनोकार्सिनोमा की पहचान की है, जिसे अग्नाशय कैंसर का सबसे खतरनाक रूप माना जाता है। इस तकनीक की सफलता को देखते हुए अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इसे ब्रेकथ्रू डिवाइस का दर्जा दिया है, जिससे इसके वैश्विक बाजार में आने का रास्ता साफ हो गया है।
भविष्य की स्वास्थ्य सेवाओं में AI की भूमिका
किउ सिजुन अब अपने खेत में सब्जियां उगा रहे हैं और एक सामान्य जीवन जी रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें तकनीक की गहराई तो समझ नहीं आती, लेकिन वे इतना जानते हैं कि समय पर मिली एक चेतावनी ने उन्हें मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया। यह मामला इस बात का प्रमाण है कि कैसे चीन की बड़ी टेक कंपनियां अब स्वास्थ्य क्षेत्र की जटिल समस्याओं का समाधान ढूंढ रही हैं। पैंक्रियाज कैंसर के अलावा अब लीवर और फेफड़ों के कैंसर की पहचान के लिए भी इसी तरह के AI मॉडल्स पर काम किया जा रहा है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि AI किसी अनुभवी डॉक्टर का विकल्प नहीं है, बल्कि यह एक सहायक उपकरण के रूप में काम करता है। यह डॉक्टरों के काम को आसान बनाता है और मानवीय भूल की गुंजाइश को कम करता है। जब एक रेडियोलॉजिस्ट दिन भर में सैकड़ों स्कैन देखता है, तो थकान के कारण छोटी खामियां छूट सकती हैं, लेकिन AI बिना थके हर पिक्सेल का बारीकी से विश्लेषण करता है। आने वाले समय में इस तरह के टूल्स को हर बड़े अस्पताल के डेटाबेस से जोड़ा जा सकता है, जिससे हर मरीज की स्क्रीनिंग खुद-ब-खुद हो जाएगी और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों को पहले ही चरण में खत्म करना संभव हो सकेगा।
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