Highlights
- झुंझुनूं जिले के 485 जांबाज अब तक देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दे चुके हैं।
- जिले के 81 से अधिक सैनिकों को कीर्ति और वीर चक्र जैसे वीरता पुरस्कार मिले हैं।
- 1971 के भारत-पाक युद्ध में शेखावाटी के 168 वीरों ने अपनी शहादत दी थी।
- वर्तमान में जिले के 1.20 लाख से अधिक जवान और पूर्व सैनिक देश की शान बढ़ा रहे हैं।
झुंझुनूं | राजस्थान का झुंझुनूं जिला अपनी सैन्य परंपरा और जांबाज सैनिकों के लिए पूरी दुनिया में पहचाना जाता है। यहां के वीरों ने करगिल की चोटियों से लेकर रेगिस्तान की तपती रेत तक हर जगह तिरंगे का मान बढ़ाया है।
शहादत और वीरता का गौरवशाली इतिहास
जिले ने अब तक देश की रक्षा करते हुए अपने 485 सपूतों को खोया है। इन वीरों की शहादत ने झुंझुनूं को वीरभूमि के रूप में स्थापित कर दिया है।
वीरता के क्षेत्र में भी यहां के जवानों का कोई सानी नहीं है। अब तक 81 से अधिक सैनिकों को विभिन्न वीरता पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।
इसमें 4 कीर्ति चक्र और 23 वीर चक्र जैसे प्रतिष्ठित सम्मान शामिल हैं। इसके अलावा 10 शौर्य चक्र और 23 सेना मेडल भी जिले के खाते में आए हैं।
1971 के युद्ध में शेखावाटी का योगदान
भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 के युद्ध में शेखावाटी क्षेत्र ने अभूतपूर्व वीरता दिखाई थी। इस युद्ध में कुल 168 जवान शहीद हुए थे।
झुंझुनूं जिले से अकेले 108 जवानों ने अपनी जान की बाजी लगाई थी। वहीं सीकर के 46 और चूरू के 12 वीर इस युद्ध में शहीद हुए थे।
हर घर से फौज में जाने का जज्बा
झुंझुनूं के लगभग हर गांव और हर घर का नाता भारतीय सेना से जुड़ा हुआ है। वर्तमान में यहां 65 हजार पूर्व सैनिक और 55 हजार सक्रिय सैनिक मौजूद हैं।
परमवीर चक्र विजेता हवलदार मेजर पीरू सिंह इस पावन धरती की सबसे बड़ी पहचान हैं। एडमिरल विजयसिंह शेखावत और ब्रिगेडियर आरएस श्योरान जैसे नामों ने इस जिले का मान बढ़ाया है।
युवाओं में सेना के प्रति अटूट उत्साह
आज भी जिले के 25 हजार से अधिक युवा तीनों सेनाओं में भर्ती होने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। युवाओं के मार्गदर्शन के लिए जिले में 24 से अधिक डिफेंस एकेडमियां चल रही हैं।
शहीदों के बच्चों के लिए सांझी छत हॉस्टल और सैनिकों के लिए ईसीएचएस पॉलीक्लिनिक जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। चिड़ावा और गुढ़ागौड़जी जैसे क्षेत्रों में कैंटीन की सुविधा भी दी जा रही है।
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