मैसूर में हुआ आयोजन: महाराणा प्रताप राजपूत समाज ट्रस्ट ने मनाई वीर योद्धा राव चांदाजी राठौड़ की 519वीं जयंती

महाराणा प्रताप राजपूत समाज ट्रस्ट ने मनाई वीर योद्धा राव चांदाजी राठौड़ की 519वीं जयंती
राव चांदाजी राठौड़
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महाराणा प्रताप राजपूत समाज ट्रस्ट, मैसूरु के तत्वावधान में मंगलवार को मारवाड़ रियासत के बलून्दा जागीर के वीर योद्धा राव चांदाजी राठौड़ (मेड़तिया राठौड़ों की चांदावत शाखा के प्रवर्तक) की 519वीं जयंती मनाई गई।

मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति और रक्षा का संदेश दिया।

मैसूरु | मंगलवार महाराणा प्रताप राजपूत समाज ट्रस्ट, मैसूरु के तत्वावधान में मंगलवार को मारवाड़ रियासत के बलून्दा जागीर के वीर योद्धा राव चांदाजी राठौड़ (मेड़तिया राठौड़ों की चांदावत शाखा के प्रवर्तक) की 519वीं जयंती मनाई गई।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पृथ्वी सिंह चांदावत ने बताया कि रणयोद्धा चांदाजी वीरता की मिसाल थे। उन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति और रक्षा का संदेश दिया।

इस अवसर पर मनोहर सिंह चौहान, मालम सिंह मेड़तिया, नरेंद्र सिंह देवड़ा, भंवर सिंह छायण, गंगा सिंह बालावत, नरेश भंडारी, मनीष मुणोत, बाबूलाल रांका, ईसाराम सुथार आदि उपस्थित रहे।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने राव चांदाजी राठौड़ के जीवन और उनके अद्वितीय बलिदान को याद करते हुए उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया। सभी ने मिलकर उनके साहस और शौर्य को नमन किया और इस मौके पर उनकी वीरता की कहानियों का स्मरण किया।

राव चांदाजी- मेड़ता के महान योद्धा

जोधपुर के पराक्रमी राव जोधाजी के पुत्रों में उनके चौथे पुत्र राव दूदाजी वीरता और वैष्णव भक्ति का अद्वितीय संगम थे। उन्होंने अपने बाहुबल से मालवा के महबूब खिलजी से मेड़ता जीता और इसे नए तरीके से बसाया।

उनके वंशज, मेड़ता में बसने के कारण 'मेड़तिया' कहलाए। राव दूदाजी के ज्येष्ठ पुत्र राव वीरमदेव और सबसे छोटे पुत्र रतनसिंह थे, जिनकी पुत्री भक्त शिरोमणि मीरांबाई के नाम से प्रसिद्ध हुई।

राव वीरमदेव के सभी पुत्र वीर योद्धा थे, जिनमें ज्येष्ठ पुत्र राव चांदाजी का जन्म वि.स. 1562 ज्येष्ठ सुदी अष्टमी को हुआ था। चांदाजी के भाई वीर जैमलजी का जन्म वि.स. 1564 आसोज सुदी एकादशी को हुआ।

चांदाजी, जैमलजी से दो वर्ष बड़े थे। मेड़ता की राजगादी पर राव जैमलजी उत्तराधिकारी बने, हालांकि वे पाटवी संतान नहीं थे। चांदाजी ने भीष्म की तरह राजगद्दी का परित्याग किया और हमेशा अपने भाई जैमलजी के प्रति वफादार रहे।

बचपन में अपंग रहे राव चांदाजी को नाथपंथ के योगी हांडी बड़ग ने अपने योगबल से ठीक किया। चांदाजी के पिताश्री राव वीरमजी ने महात्मा हांडी बडंग को राजमहल में न्यौता दिया, और महात्मा ने चांदाजी को 24 लड्डू फेंककर 24 युद्धों में विजय का आशीर्वाद दिया। यह युद्ध 'चांदाजी रा चौबीस परवाड़ा' के नाम से प्रसिद्ध हुए। राव चांदाजी को कुंवरपदे में ही बलुन्दा ग्राम की जागीर दी गई।

उन्होंने बलुन्दा को अपनी जागीर का मुख्य केंद्र बनाया। चांदाजी का जीवन युद्धरत रहा और उन्होंने कई बड़े युद्ध लड़े। जोधपुर के राव मालदेव और उनके भाई राव जैमलजी के बीच के वैर में चांदाजी ने जोधपुर का साथ दिया, जबकि उनके सगे भाई ईसरदासजी और जग्गमालजी ने राव जैमलजी का समर्थन किया।

राव मालदेवजी के देहांत के बाद राव चंद्रसेनजी के प्रमुख सरदारों में चांदाजी रहे। जब अकबर के नवाब हुसैन कुल्ली खां ने जोधपुर पर हमला किया, तो चांदाजी ने उसे दो बार हराया। अंततः चांदाजी नागौर गए जहां नवाब ने छल से चांदाजी की हत्या कर दी। चांदाजी ने अपनी अंतिम लड़ाई में चार पुत्रों के साथ वीरगति प्राप्त की।

चांदाजी की संतति, स्वतंत्र स्वभाव के कारण 'चांदावत' कहलाए। इस वंश के वीरों ने राजपुताना के निर्णायक युद्धों में अपना बलिदान दिया। खानवा, हल्दीघाटी, गिरी-सुमेल से द्वितीय विश्व युद्ध तक, चांदावतों ने अपना परचम फहराया और अनेक जागीरें प्राप्त कीं।

इनमें बलुन्दा, कुड़की, सेवरिया, नोखा, नीमड़ी, छापरी, देसवाल, ओलादन, गागुड़ा, लाई, मुगदड़ा, धनापो, दुदड़ास, आकोदिया, दधवाड़ा, भावला, रोहिणा, रियां शामदास, रेंवत, बाकलियावास, सेनणी, टालनपुर, खाखड़की, पिपाड़ा, तिगरा, तिबड़ी, गोटन, डाबला, मेड़ता रोड, बस्सी, बांकास, मांगीलियावास, रूपपुरा, मिण्डकिया, कोसाणा, मेरासिया, खामोर, अजमेरा और पुष्कर के पास बस्सी, कड़ेल मँजेवला, अहड़ा बेड़ा ढाल, शोल, मायला इत्यादि ठिकाने प्रमुख थे।

राजपुताना के चारण कवियों ने राव चांदाजी की वीरता पर अनेक रचनाएँ लिखी हैं। "चांदाजी री वैली" डिंगल का एक महाग्रंथ है, जिसे माधवदासजी ने लिखा और चांदावतों पर बड़ा उपकार किया। यह ग्रंथ राजस्थानी शोध संस्थान चौपासनी द्वारा प्रकाशित किया गया है और हर चांदावत के लिए यह रामायण या श्रीमद्भगवद्गीता के समान पूजनीय है।

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