Highlights
- 11 फरवरी 2026 को मंडवारिया में दाता सादुल सिंह जी के भव्य मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई।
- क्षत्रिय और आदिवासी समाज की एकजुटता का प्रतीक: मंदिर में मालजी मीणा की प्रतिमा भी स्थापित।
- हेलीकॉप्टर से की गई भव्य पुष्प वर्षा और हजारों महिलाओं ने निकाली कलश यात्रा।
- जूना अखाड़ा के महंत और राजस्थान सरकार के कई दिग्गज मंत्री व राजनेता रहे मौजूद।
सिरोही | राजस्थान की वीर प्रसूता धरा सिरोही के मंडवारिया गांव में 11 फरवरी 2026 का दिन इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया है। अवसर था 1857 की क्रांति के महानायक और जन-जन की आस्था के केंद्र दाता सादुल सिंह जी देवड़ा के नवनिर्मित भव्य मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा का। इस महाआयोजन ने न केवल एक ऐतिहासिक योद्धा को उनका यथोचित सम्मान दिलाया, बल्कि वर्तमान समाज को 'सामाजिक समरसता' का एक ऐसा जीवंत पाठ पढ़ाया, जिसकी गूंज पूरे प्रदेश में सुनाई दे रही है। मंडवारिया के नरेन्द्र सिंह देवड़ा और ठा. सा. भंवर सिंह जी रूप सिंह जी के परिवार द्वारा आयोजित इस समारोह में उमड़े जनसैलाब ने यह सिद्ध कर दिया कि राष्ट्रभक्ति और श्रद्धा की कोई सीमा नहीं होती।

सामाजिक समरसता का अद्भुत संगम: एक जाजम पर '36 कौम'
इस आयोजन की सबसे बड़ी और अनूठी विशेषता इसका 'सर्व समाज' को जोड़ने वाला स्वरूप रहा। आमतौर पर धार्मिक आयोजन किसी एक समाज या वर्ग तक सीमित रह जाते हैं, लेकिन मंडवारिया में नजारा बिल्कुल अलग और प्रेरणादायक था। यहाँ क्षत्रिय समाज के साथ-साथ आदिवासी मीणा समाज, देवासी समाज और क्षेत्र की अन्य सभी '36 कौम' के लोग एक ही भाव से नतमस्तक थे। यह दृश्य राजस्थान की गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे को मजबूती प्रदान करने वाला रहा।

मंदिर के गर्भगृह में जहाँ एक ओर दाता सादुल सिंह जी की भव्य प्रतिमा विराजमान है, वहीं दूसरी ओर उनके परम सहयोगी और क्रांति में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले मालजी मीणा की प्रतिमा भी पूरे सम्मान के साथ स्थापित की गई है।

एक ही मंदिर में राजपूत और आदिवासी योद्धाओं का साथ पूजा जाना सामाजिक भेद-भाव को मिटाने वाली एक ऐतिहासिक पहल है। यह इस बात का प्रतीक है कि 1857 की क्रांति में देश के लिए रक्त बहाने वाले वीरों ने कभी जाति-पांति को महत्व नहीं दिया, और आज उनकी विरासत भी हम सबको एक सूत्र में पिरो रही है।

आकाश से पुष्प वर्षा और भक्ति का उल्लास
प्राण-प्रतिष्ठा के शुभ मुहूर्त पर मंडवारिया का आकाश भी जैसे अपने लाडले सपूत के सम्मान में झुक गया। आयोजन का मुख्य आकर्षण हेलीकॉप्टर द्वारा की गई भव्य पुष्प वर्षा रही। जैसे ही मंदिर के शिखर पर ध्वजा फहराई गई, आसमान से बरसते फूलों ने वहां मौजूद हजारों श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। ढोल-नगाड़ों की थाप और "दाता सादुल सिंह अमर रहे" के जयकारों से अरावली की वादियां गूंज उठीं। हर तरफ उत्साह और उमंग का माहौल था।

इससे पूर्व, गांव की महिलाओं द्वारा भव्य कलश यात्रा निकाली गई। राजस्थानी पारंपरिक वेशभूषा में सजी-धजी हजारों महिलाओं ने सिर पर मंगल कलश धारण कर गांव की गलियों को भक्तिमय कर दिया। आयोजन स्थल पर किसी बड़े उत्सव या मेले जैसा माहौल था, जहाँ हाट-बाजार सजे थे और बच्चों के लिए मनोरंजन के साधन भी उपलब्ध थे। इस भव्यता ने आयोजन को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न रखकर एक लोक उत्सव में बदल दिया।
इतिहास के नायक: कौन थे दाता सादुल सिंह?
नई पीढ़ी के लिए दाता सादुल सिंह केवल एक लोकदेवता नहीं, बल्कि स्वाभिमान और वीरता के जीवंत प्रेरणा स्रोत हैं। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि 1857 में जब पूरा देश अंग्रेजों के खिलाफ उबल रहा था, तब सिरोही रियासत में सादुल सिंह देवड़ा ने विद्रोह की मशाल थामी थी। वे अपनी मातृभूमि पर ब्रिटिश हुकूमत का आधिपत्य किसी भी कीमत पर स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

उन्होंने अरावली की दुर्गम पहाड़ियों को अपना ठिकाना बनाया और गुरिल्ला युद्ध पद्धति से अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया। नसीराबाद और टॉडगढ़ छावनियों पर उनके साहसिक हमलों ने ब्रिटिश सेना की नींद उड़ा दी थी। उनकी वीरता का सबसे बड़ा प्रमाण माउंट आबू में तत्कालीन अंग्रेज कमांडिंग ऑफिसर 'कैप्टन कोनोली' को बंधक बनाना था। हालांकि, बाद में अपनों के विश्वासघात और अंग्रेजों के षड्यंत्र के चलते उन्हें धोखे से बंदी बनाया गया और वे वीरगति को प्राप्त हुए। उनके इस बलिदान ने उन्हें 'झुंझार जी' (लोकदेवता) का दर्जा दिलाया।

दिग्गज संतों और राजनेताओं की उपस्थिति
इस ऐतिहासिक पल का साक्षी बनने के लिए धर्म और राजनीति जगत की कई बड़ी हस्तियां मंडवारिया पहुंचीं। जूना अखाड़ा के अंतर्राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री महंत नारायण गिरी जी महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा कि यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि राष्ट्रप्रेम का एक जीवंत विद्यालय है। उन्होंने समाज को एकजुट रहने और अपनी संस्कृति को बचाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने के लिए बूंदी के पूर्व महाराव राजा वंशवर्धन सिंह हाड़ा विशेष रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने राजपूताना के गौरवशाली इतिहास को याद करते हुए सादुल सिंह जी के बलिदान को नमन किया। इसके अलावा, राजस्थान सरकार के मंत्री ओटाराम देवासी, पूर्व सांसद मानवेन्द्रसिंह जसोल, मुख्यमंत्री के सलाहकार व पूर्व विधायक संयम लोढ़ा, भाजपा महामंत्री गणपत सिंह देवड़ा और युवा नेता मोती सिंह जोधा ने भी कार्यक्रम में शिरकत की। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में इस आयोजन को सामाजिक एकता की दिशा में एक मील का पत्थर बताया।

एक नई शुरुआत और संदेश
मंडवारिया में संपन्न हुआ यह प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव केवल एक मंदिर का निर्माण नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक जड़ों को फिर से सींचने का प्रयास है। नरेंद्र सिंह देवड़ा और उनके परिवार ने इस मंदिर के माध्यम से अपने पूर्वज को जो श्रद्धांजलि दी है, वह आने वाली कई पीढ़ियों के लिए गर्व का विषय रहेगी।
दाता सादुल सिंह और मालजी मीणा की संयुक्त विरासत हमें यह याद दिलाती रहेगी कि जब देश और धर्म की रक्षा की बात आती है, तो हमें जाति-पांति की दीवारों को तोड़कर एक होना होगा। यह आयोजन राजस्थान के सामाजिक इतिहास में एकता के एक नए अध्याय के रूप में याद रखा जाएगा।
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