Rajasthan: बाड़मेर: 80% गूगल खत्म, खेजड़ी हर साल 20.93% सूख रही

बाड़मेर: 80% गूगल खत्म, खेजड़ी हर साल 20.93% सूख रही
बाड़मेर: वन संपदा पर गहराया संकट
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Highlights

  • बाड़मेर में 80 सालों में 80% से अधिक गूगल खत्म हो चुका है।
  • खेजड़ी के पेड़ों की मृत्यु दर सालाना 20.93% तक पहुंच गई है।
  • जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक दोहन और खनन प्रमुख कारण हैं।
  • रोहिड़ा भी संकटग्रस्त श्रेणी में है और इसकी अवैध कटाई जारी है।

बाड़मेर: बाड़मेर (Barmer) में जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक दोहन और खनन के कारण खेजड़ी (Khejri), रोहिड़ा (Rohida) और गूगल (Guggul) जैसी बहुमूल्य वनस्पतियां तेजी से घट रही हैं। आफरी जोधपुर (AFRI Jodhpur) के अनुसार, खेजड़ी की मृत्यु दर 20.93% है, जबकि गूगल 80 सालों में 80% से अधिक घट चुका है। यह मरुस्थलीय खेती और पशुपालन के लिए गंभीर खतरा है।

पश्चिमी राजस्थान का बाड़मेर जिला अपनी कठिन जलवायु के बावजूद खेजड़ी, रोहिड़ा, जाल, फोग, कुमट और गूगल जैसी बहुमूल्य वनस्पतियों के लिए जाना जाता रहा है। इन वनस्पतियों ने सदियों से इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय जीवन को सहारा दिया है।

हालांकि, अब वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट हो रहा है कि जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक मानवीय दोहन, अवैध खनन गतिविधियां, भूजल का खारापन और चराई का दबाव इनकी संख्या में तेजी से कमी ला रहा है। आलम यह है कि जिले के कई गांवों से ये प्रमुख प्रजातियां लगभग गायब ही हो चुकी हैं, जिससे जैव विविधता को भारी नुकसान हो रहा है।

मरुस्थल की जीवनरेखा खेजड़ी भी खतरे में

राजस्थान का राज्य वृक्ष खेजड़ी, जिसे मरुस्थलीय खेती और पशुपालन की रीढ़ माना जाता है, बाड़मेर में गंभीर संकट का सामना कर रहा है। आफरी जोधपुर के एक सर्वेक्षण के अनुसार, पश्चिमी रेगिस्तानी जिलों में खेजड़ी के पेड़ों की मृत्यु दर 18.08% से 22.67% तक दर्ज की गई है।

यह औसत गिरावट लगभग 20.93% प्रति वर्ष है, जो पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों के लिए चिंता का विषय है। इस गिरावट का एक प्रमुख कारण जड़ों का सड़ना और कीटों का प्रकोप बताया गया है, जो पेड़ों को अंदर से कमजोर कर रहा है।

इसके अलावा, अत्यधिक बोरवेल सिंचाई से भूमिगत जल का खारा होना भी खेजड़ी के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। खेती के लिए लगातार डालियां काटना, खेतों का तेजी से विस्तार और समतलीकरण भी इस महत्वपूर्ण वृक्ष के अस्तित्व के लिए घातक साबित हो रहा है।

बहुमूल्य गूगल की आबादी में भारी गिरावट

गूगल एक महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक औषधीय पौधा है, जो पारंपरिक चिकित्सा में सदियों से उपयोग होता रहा है। यह रेगिस्तान में बहुतायत में पाया जाता था, लेकिन अब इसकी स्थिति अत्यंत संकटग्रस्त है।

आईयूसीएन रेड लिस्ट के अनुसार, यह प्रजाति गंभीर खतरे में है और इसे तत्काल संरक्षण की आवश्यकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि पिछले लगभग 80 वर्षों में इसकी प्राकृतिक आबादी में 80 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आ चुकी है, जो एक भयावह आंकड़ा है।

बाड़मेर के पथरीले और ओरण क्षेत्रों में इसका फैलाव तेजी से सिमट रहा है। इसकी घटती उपलब्धता न केवल पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रही है, बल्कि पारंपरिक औषधीय ज्ञान के लिए भी खतरा पैदा कर रही है।

संकटग्रस्त रोहिड़ा पर भी मंडरा रहा खतरा

रोहिड़ा भी बाड़मेर जिले के प्रमुख पेड़ों में से एक है, जिसकी लकड़ी बहुत कीमती और दीमक रोधी होती है। इसकी सुंदरता और मजबूती के कारण फर्नीचर उद्योग में इसकी भारी मांग है।

सरकार ने इसकी कटाई पर प्रतिबंध लगा रखा है, इसके बावजूद इसकी अंधाधुंध अवैध कटाई जारी है। अंतरराष्ट्रीय वनस्पति अध्ययनों में इसे भी संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है।

इसकी धीमी वृद्धि दर, अवैध कटाई और फर्नीचर उद्योग में अत्यधिक उपयोग के कारण इसकी प्राकृतिक आबादी में लगातार गिरावट आ रही है। यह स्थिति इस खूबसूरत पेड़ के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा रही है।

वनस्पतियों के विलुप्त होने के प्रमुख कारण और प्रभाव

जिले की इन बहुमूल्य वनस्पतियों के तेजी से घटने के पीछे कई जटिल कारण जिम्मेदार हैं। जलवायु परिवर्तन एक बड़ा कारक है, जो इन पौधों के प्राकृतिक आवास और विकास चक्र को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।

इसके साथ ही, मानवीय गतिविधियां जैसे अत्यधिक दोहन, अवैध खनन और पशुओं द्वारा अनियंत्रित चराई का दबाव भी इनकी संख्या को लगातार कम कर रहा है। भूजल का बढ़ता खारापन भी इन मरुस्थलीय प्रजातियों के लिए एक गंभीर चुनौती बन गया है, क्योंकि ये खारे पानी के प्रति संवेदनशील होती हैं।

इन वनस्पतियों का विलुप्त होना न केवल बाड़मेर की जैव विविधता के लिए खतरा है, बल्कि यह स्थानीय अर्थव्यवस्था, पशुपालन और पारंपरिक जीवनशैली पर भी गहरा नकारात्मक प्रभाव डालेगा। इन प्रजातियों के संरक्षण के लिए तत्काल और प्रभावी कदम उठाना आवश्यक है।

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