Highlights
- मंडल अध्यक्षों की नियुक्ति पर विवाद
- 29 जनवरी तक का अल्टीमेटम
- प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ से मुलाकात, गुटबाजी चरम पर
चित्तौड़गढ़ | राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में भारतीय जनता पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी कलह अब खुलकर सामने आ गई है। निर्दलीय विधायक से भाजपा में लौटे चंद्रभान सिंह आक्या और सांसद सीपी जोशी के गुटों के बीच वर्चस्व की जंग तेज हो गई है। हाल ही में हुई 6 मंडल अध्यक्षों की नियुक्ति ने इस आग में घी डालने का काम किया है, जिससे पार्टी के भीतर दो फाड़ की स्थिति पैदा हो गई है।
मंडल अध्यक्षों की नियुक्ति पर गहराया विवाद
विवाद की मुख्य जड़ चित्तौड़गढ़ विधानसभा क्षेत्र के 6 मंडल अध्यक्षों की नियुक्ति है। असंतुष्ट कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इन नियुक्तियों में नियमों और मापदंडों को पूरी तरह दरकिनार किया गया है। आरोप है कि नियुक्त किए गए 6 में से 5 अध्यक्ष विधायक चंद्रभान सिंह आक्या के खेमे के हैं। इस पक्षपातपूर्ण निर्णय से सांसद सीपी जोशी के समर्थक काफी नाराज हैं। विरोध जताने के लिए असंतुष्ट धड़े ने एक गुप्त बैठक भी की, जिसमें रणनीति लीक होने से बचाने के लिए सभी कार्यकर्ताओं के मोबाइल फोन बाहर एक थैले में रखवा दिए गए थे।
चंद्रभान सिंह की वापसी से बदला समीकरण
गौरतलब है कि 2023 के विधानसभा चुनाव में टिकट कटने के बाद चंद्रभान सिंह आक्या ने निर्दलीय चुनाव लड़ा था और भारी बहुमत से जीत हासिल की थी। चुनाव के बाद उन्होंने भाजपा को समर्थन दिया और पार्टी में वापस सक्रिय हो गए। उनकी इस सक्रियता ने सांसद खेमे की चिंताएं बढ़ा दी हैं। असंतुष्ट गुट का कहना है कि नियुक्तियों में 45 साल की आयु सीमा जैसे नियमों का उल्लंघन किया गया है। सूत्रों के मुताबिक, प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने कार्यकर्ताओं को बताया कि क्षेत्रीय विधायक, सांसद और जिलाध्यक्ष से नाम मांगे गए थे और उनकी सहमति के बाद ही नियुक्तियां की गईं, लेकिन सांसद खेमे ने इस पर आपत्ति जताई है।
मदन राठौड़ को अल्टीमेटम
मामला अब भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ तक पहुंच चुका है। धनेत सरपंच रणजीत सिंह के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने जयपुर में मदन राठौड़ से मुलाकात की और अपनी शिकायत दर्ज कराई। कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि 29 जनवरी तक इन नियुक्तियों पर पुनर्विचार नहीं किया गया, तो वे सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करेंगे। आशंका जताई जा रही है कि यदि समय रहते विवाद नहीं सुलझा तो पार्टी की अंदरूनी खींचतान सार्वजनिक रूप से सड़क पर आ सकती है।
पार्टी के सामने बड़ी चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के लिए यह स्थिति काफी पेचीदा है। यदि पार्टी नियुक्तियां बदलती है, तो उसे कुछ विशेष वर्गों की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है, क्योंकि नियुक्त पदाधिकारियों में जैन समाज सहित अन्य वर्गों का प्रतिनिधित्व है। वहीं, यदि बदलाव नहीं होता है, तो सांसद खेमे का असंतोष आगामी संगठनात्मक कार्यों में बाधा बन सकता है। फिलहाल, प्रदेश नेतृत्व ने आश्वासन दिया है, लेकिन चित्तौड़गढ़ की राजनीति में तनाव बरकरार है और सभी की नजरें 29 जनवरी की समयसीमा पर टिकी हैं।
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