Highlights
- वंदेमातरम् ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भावना को पुनर्जीवित किया।
- आजादी के आंदोलन में वंदेमातरम् ने जन-जन में जोश भरा।
- गृहमंत्री ने कांग्रेस पर वंदेमातरम् के प्रति तुष्टिकरण का आरोप लगाया।
- सरकार वंदेमातरम् की 150वीं वर्षगांठ को भव्य रूप से मना रही है।
नई दिल्ली: गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में वंदेमातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर इसके ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि कैसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीक बना और आजादी के आंदोलन को प्रेरित किया। शाह ने वंदेमातरम् को भारत के पुनर्जागरण का मंत्र बताया।
गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में वंदेमातरम् की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक महत्वपूर्ण संबोधन दिया। उन्होंने इस अमर गीत की रचना की पृष्ठभूमि और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इसकी अविस्मरणीय भूमिका पर प्रकाश डाला। शाह ने जोर देकर कहा कि वंदेमातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, उसकी संस्कृति और उसके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उद्घोष है, जिसने सदियों की गुलामी और आक्रमणों के बाद देश को पुनर्जागृत किया।
वंदेमातरम् की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और रचना
अमित शाह ने वंदेमातरम् की रचना की पृष्ठभूमि को याद करते हुए कहा कि यह उस समय लिखा गया था जब भारत सदियों तक इस्लामिक आक्रमणों को झेल रहा था, जिसने देश की संस्कृति और इतिहास को क्षीण करने का काम किया। इसके बाद अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में भारत पर एक नई सभ्यता और संस्कृति थोपने का प्रयास किया। ऐसे कठिन समय में बंकिम बाबू ने वंदेमातरम् की रचना की।
उन्होंने बताया कि इस गीत के माध्यम से बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने हमारी मूल सभ्यता, हमारे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और देश को माता के रूप में पूजने की हमारी प्राचीन परंपरा को पुनः स्थापित किया। यह गीत देखते ही देखते, बिना किसी प्रचार के, हर व्यक्ति के मन और आत्मा को छू गया। उस समय न सोशल मीडिया था, न प्रचार के कोई साधन थे। उल्टे, तत्कालीन सरकार इसे रोकना चाहती थी, प्रतिबंध लगाती थी और वंदेमातरम् बोलने वालों पर कोड़े बरसाए जाते थे, उन्हें जेल में डाल दिया जाता था।
इन सभी प्रतिबंधों के बावजूद, वंदेमातरम् कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैल गया। यह भारत की संस्कृति के प्रति श्रद्धा रखने वाले सभी लोगों के लिए पुनर्जागरण का मंत्र बन गया। शाह ने कहा कि गुलामी के कालखंड में कई मंदिर, विश्वविद्यालय, कला केंद्र, कृषि व्यवस्थाएं, शिक्षा व्यवस्थाएं और लाइब्रेरी अस्त-व्यस्त हो गईं या तोड़ दी गईं, लेकिन हमारी संस्कृति के भाव को जनमानस से कोई नहीं मिटा सका। उस भाव को जागरूक और संगठित करने की जरूरत थी, और उसी वक्त बंकिम बाबू ने वंदेमातरम् की रचना की।
राष्ट्र की आत्मा को जगाने वाला मंत्र
गृहमंत्री ने आगे कहा कि वंदेमातरम् का नारा पूरे देश में फैल गया और अंडमान निकोबार की जेलों तक पहुंच गया। इसे न अंग्रेज रोक सके और न ही अंग्रेजों की सभ्यता को स्वीकारने वाले लोग। वंदेमातरम् ने एक ऐसे राष्ट्र को जागरूक किया जो अपनी दिव्य शक्ति को भुला चुका था। यह गीत राष्ट्र की आत्मा को जागरूक करने का काम था।
इसीलिए महर्षि अरविंद ने कहा था कि वंदेमातरम् भारत के पुनर्जन्म का मंत्र है। श्री अरविंद का यह वाक्य वंदेमातरम् की महत्ता को बताता है। अरविंद घोष ने यह भी कहा कि देश को एक ऐसे मंत्र की आवश्यकता थी, और ईश्वर ने उसे साकार करने के लिए ही बंकिम बाबू को इस भूमि पर भेजा था। श्री अरविंद का वंदेमातरम् के लिए यह भाव बच्चे-बच्चे के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन गया और हमारे आजादी का नारा बन गया।
भारत की अद्वितीय सांस्कृतिक पहचान
अमित शाह ने भारत की अद्वितीय पहचान पर जोर देते हुए कहा कि हमारा देश पूरी दुनिया में एक अनूठा देश है। दुनिया के कई देशों की रचना अधिनियमों से हुई, कहीं युद्धों के कारण हुई, कहीं युद्ध के बाद संधि के कारण हुई। भारत एकमात्र ऐसा देश है जिसकी सीमाएं कोई अधिनियम से तय नहीं की हैं। हमारे देश की सीमाएं हमारी संस्कृति ने तय की हैं, और संस्कृति ने ही इस भारत को जोड़कर रखा है।
इसीलिए, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का जो विचार था, उसे सबसे पहले गुलामी के कालखंड में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी ने जागरूक करने का काम किया। पूरे देश को एक बार फिर से देखें तो हमें मालूम पड़ेगा कि हमारे देश को जोड़ने वाला तंत्र-मंत्र हमारी संस्कृति है। इसी के कारण वंदेमातरम् का जो उद्घोष हुआ, उसने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सिद्धांत को पहली बार स्थापित करने का काम किया।
बंकिम बाबू का दूरदर्शी संदेश
जब अंग्रेजों ने वंदेमातरम् पर कई सारे प्रतिबंध लगाए, तब बंकिम बाबू ने एक पत्र में लिखा था, “मुझे कोई आपत्ति नहीं है, मेरे सभी साहित्य को गंगा जी में बहा दिया जाए। यह मंत्र वंदेमातरम् अनंत काल तक जीवित रहेगा। यह एक महान गान होगा और लोगों के हृदय को जीत लेगा और भारत के पुनर्निर्माण का यह मंत्र होगा।”
शाह ने कहा कि आज हम देख रहे हैं कि बंकिम बाबू के वे शब्द सच हुए हैं। भले देर से ही सही, यह पूरा राष्ट्र आज सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की परिकल्पना को स्वीकार कर आगे बढ़ रहा है। हम सब जो भारत माता की संतानें हैं, वह मानते हैं कि यह देश कोई जमीन का टुकड़ा नहीं है, बल्कि उसको हम मां के रूप में देखते हैं और उसका भक्ति गान भी करते हैं। उस भक्ति गान की अभिव्यक्ति ही वंदेमातरम् है।
भारत माता की कल्पना और त्रिदेवों का स्वरूप
गृहमंत्री ने सदन में बताया कि वंदेमातरम् की रचना में हमारे जीवन में भारत माता की कल्पना का जो योगदान है, उसको बहुत अच्छे तरीके से और भावना के साथ वर्णन किया गया है। जल, फल और समृद्धि तीनों की दायिनी भारत माता को बताया गया है। शोभित पुष्पों से मन को प्रफुल्लित करने वाली भी भारत माता को बताया गया है।
उन्होंने कहा कि सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा – ये तीनों का जो स्वरूप है, वह भारत माता है। एक प्रकार से हमारी समृद्धि, हमारी सुरक्षा, हमारा ज्ञान, हमारा विज्ञान – ये सब भारत मां की ही कृपा है और उसकी आराधना से ही प्राप्त हो सकता है। इतना बड़ा एक संकल्प बंकिम बाबू ने रखा। दुर्गा की वीरता, लक्ष्मी की संपन्नता और सरस्वती की मेघा – ये तीनों हमें भारत मां की कृपा ही दे सकती है, या यह मिट्टी ही दे सकती है। इसीलिए इसको बार-बार प्रणाम करना चाहिए, मां को प्रणाम करना चाहिए।
मातृभूमि का चिर पुरातन भाव
अमित शाह ने बताया कि जिसकी उद्घोषणा 150 साल पहले बंकिम बाबू ने की, यह विचार तो बहुत चिर पुरातन है। रामायण के अंदर प्रभु श्री राम ने भी जब उनको सलाह दी गई कि इतनी वैभवशाली लंका है, आप लंका जीत ही लिए हो, तब अयोध्या जाकर क्या करना है, यहीं रह जाते हैं, तब उन्होंने कहा था कि माता और मातृभूमि ईश्वर से भी बड़ी होती है। मैं माता और मातृभूमि का ध्यान करता हूं।
मातृभूमि का महिमामंडन प्रभु श्री राम ने भी किया, आचार्य शंकर ने भी किया और आचार्य चाणक्य ने भी किया। इन सभी ने समय-समय पर हमारे अस्तित्व को मातृभूमि के साथ जोड़ने का काम किया। मातृभूमि ही हमें पहचान देती है, वही हमें भाषा देती है, वही सभ्य जीवन जीने की संस्कृति का आधार बनाती है और वही हमारे जीवन को ऊपर उठाने का अवसर देती है। इसलिए मातृभूमि से ज्यादा कुछ हो नहीं सकता। यह भाव जो चिर पुरातन भाव था, उसको बंकिम बाबू ने पुनर्जीवित किया।
उन्होंने कहा कि घनघोर रात्रि जैसे गुलामी के कालखंड के अंदर जैसे एक बिजली प्रकाश फैला देती है, उसी प्रकार से वंदेमातरम् के गान ने घनघोर अंधेरे के अंदर जन-जन के अंदर गुलामी की मानसिकता छोड़कर आजादी की प्राप्ति, स्वराज की प्राप्ति का एक जोश जगाने का काम किया।
महर्षि अरविंद और वंदेमातरम् की आध्यात्मिक शक्ति
गृहमंत्री ने महर्षि अरविंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने वंदेमातरम् को गीत नहीं, हमारी आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना। उन्होंने बहुत सुंदर तरीके से वर्णन किया है कि स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों प्रकार से वंदेमातरम् भारत की शक्ति को जगाता है।
- स्थूल शरीर: वंदेमातरम् का उच्चारण हमारे शरीर में शक्ति और उत्साह भरता है। राष्ट्रभक्ति की क्रिया प्रक्रिया शक्ति को जगाती है।
- सूक्ष्म शरीर: यह हमारी भावनाओं और विचारों को शुद्ध करता है और हमारी चेतना को जागृत करता है।
- कारण आध्यात्मिक शरीर: महर्षि अरविंद ने कहा कि बंकिम बाबू ने एक ऋषि चेतना से प्राप्त मेघा से ही वंदेमातरम् की रचना की है।
उन्होंने कहा कि यह गीत केवल देशभक्ति की, देश प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारत माता की दिव्य शक्ति का आह्वान है। भारत की मूल चेतना, सनातन शक्ति को पुनर्जीवित करने का यह वंदेमातरम् मंत्र है। इसीलिए आजादी के वक्त सभी हमारे नेताओं ने वंदेमातरम् को आजादी के आंदोलन का आधार बनाने का काम किया।
स्वतंत्रता संग्राम में वंदेमातरम् का उद्घोष
अमित शाह ने बताया कि कई सारे हमारे आजादी के संग्राम के सेनानी जिनको अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ाया, उन सब में एक चीज सामान्य निकल कर आती है कि फांसी के तख्ते पर चढ़ते-चढ़ते जो शहीद अंतिम शब्द बोले, वे सभी के मुंह से वंदेमातरम् ही थे। स्वदेशी का आह्वान करना हो, विदेशी माल का बहिष्कार करना हो, राष्ट्रीय शिक्षा का आह्वान जगाना हो, हर वक्त राष्ट्रभक्ति जगाते वक्त वंदेमातरम् का उद्घोष इस देश ने सुना भी और महसूस भी किया।
पंजाब के गदर आंदोलन में वंदेमातरम् के शीर्षक से कई पर्चे बांटे गए। महाराष्ट्र में वंदेमातरम् के विशेष अंक गणपति और शिवाजी के उत्सव में बेचे-बांटे जाते थे। तमिलनाडु में सुब्रमण्यम भारती जी ने तमिल अनुवाद कर हिंद महासागर को भी क्रांति की चेतना से आंदोलित कर दिया था।
1907 में कोलकाता में वंदेमातरम् नाम का एक अंग्रेजी अखबार शुरू हुआ, जिसके संपादक महर्षि अरविंद थे। ब्रिटिश सरकार ने उसको सबसे खतरनाक राष्ट्रवादी पत्र माना। श्री अरविंद पर राजद्रोह का मुकदमा भी चला और उनको सजा भी हुई। अंततोगत्वा उसको प्रतिबंधित कर दिया गया।
कांग्रेस और वंदेमातरम् का संबंध
गृहमंत्री ने कांग्रेस के अधिवेशनों में वंदेमातरम् के महिमामंडन का भी जिक्र किया। 1896 में गुरुवर टागोर ने कांग्रेस अधिवेशन में इसको पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया। 1905 में कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में महान कवयित्री गायिका सरला देवी चौधरानी ने पूर्ण वंदेमातरम् का गायन किया।
15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ, सुबह 6:30 बजे सरदार पटेल के आग्रह पर पंडित ओमकारनाथ ठाकुर जी ने आकाशवाणी से अपने मधुर स्वर में वंदेमातरम् का गान कर देश को भावुक कर दिया। इन सभी भावनाओं को देखते हुए संविधान सभा की अंतिम बैठक 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद जी की अध्यक्षता में हुई, उसमें राष्ट्रगान के बराबर सम्मान देते हुए वंदेमातरम् को राष्ट्रगीत घोषित करने का काम किया गया।
कांग्रेस पर तुष्टिकरण के आरोप
अमित शाह ने कांग्रेस पर वंदेमातरम् के प्रति तुष्टिकरण की नीति अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कल जब इस सदन में वंदेमातरम् की चर्चा हो रही थी, तब कांग्रेस के कई सदस्य इसे राजनीतिक हथकंडा या मुद्दों पर से ध्यान भटकाने का हथियार मान रहे थे। उन्होंने कहा कि मुद्दों पर चर्चा करने से कोई नहीं डरता, संसद का बहिष्कार हम नहीं करते। संसद चलने दें तो सब मुद्दों पर चर्चा होगी, हमें कुछ डरने जैसा नहीं है, छिपाने जैसा नहीं है। कोई भी मुद्दा हो, हम चर्चा करने के लिए तैयार हैं।
उन्होंने कहा कि वंदेमातरम् के गान की चर्चा को टालने की यह मानसिकता नई नहीं है। यह तो वंदेमातरम् का 150वां साल है। हर महान रचना का, हर महान घटना का महत्वपूर्ण साल कई मायनों में हमारे देश में मनाया जाता है।
वंदेमातरम् के 50 और 100 साल
अमित शाह ने इतिहास में पीछे मुड़कर देखते हुए कहा कि जब वंदेमातरम् के 50 साल हुए, तब देश आजाद नहीं हुआ था। वंदेमातरम् की स्वर्ण जयंती 1937 में हुई। तब जवाहरलाल नेहरू जी ने वंदेमातरम् के दो टुकड़े कर उसको दो अंतरों तक सीमित करने का काम किया। उन्होंने कहा कि यहीं से तुष्टिकरण की शुरुआत हुई और वह तुष्टिकरण जाकर देश के विभाजन में परिणत हुआ।
शाह ने कहा कि मेरे जैसे कई लोगों का मानना है कि अगर वंदेमातरम् के तुष्टिकरण की नीति के तहत दो टुकड़े न करते तो देश का बंटवारा नहीं होता, आज देश पूरा होता। 50 साल के बाद, जब वंदेमातरम् 100 साल का हुआ, सबको उम्मीद थी कि 100 साल मनाए जाएंगे, मगर 100 साल हुआ तब वंदेमातरम् का महिमामंडन का सवाल ही नहीं था, क्योंकि वंदेमातरम् बोलने वाले जो सारे लोग थे, उनको इंदिरा जी ने जेल में बंद कर दिया।
उन्होंने आपातकाल का जिक्र करते हुए कहा कि इस देश में आपातकाल लगाया गया, विपक्ष के लाखों लोगों को, लाखों समाज सेवियों को, स्वयंसेवी संगठन के लोगों को जेल में भर दिया गया, कोई कारण के बगैर अखबारों पर ताले लगा दिए गए। यहां तक कि आकाशवाणी में किशोर कुमार की आवाज ही नहीं आती थी, गाने भी लता जी की आवाज में ही आते थे। पूरे देश को जब वंदेमातरम् 100 साल का हुआ, पूरे देश को बंदी बनाकर रख दिया गया।
लोकसभा में गांधी परिवार की अनुपस्थिति
गृहमंत्री ने कहा कि कल 150वां साल है, 150वें साल में लोकसभा में चर्चा हुई। उन्होंने कांग्रेस पार्टी की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जिस कांग्रेस पार्टी के अधिवेशनों की शुरुआत गुरुवर टागोर जैसे लोग वंदेमातरम् गा कर कराते थे, वंदेमातरम् कांग्रेस पार्टी के आजादी के आंदोलन का एक मंत्र बना था, वह वंदेमातरम् के महिमामंडन करने के लिए जब लोकसभा में चर्चा हुई, गांधी परिवार के दोनों सदस्य नदारद थे। दो में से एक भी वहां उपस्थित नहीं था।
उन्होंने आरोप लगाया कि जवाहरलाल नेहरू से लेकर आज के कांग्रेस के नेतृत्व तक, वंदेमातरम् का विरोध कांग्रेस के खून में है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी की एक नेत्री ने कहा है कि वंदेमातरम् की आज चर्चा की कोई जरूरत नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह रिकॉर्ड का हिस्सा है और उन्होंने शाम तक उन कांग्रेस सदस्यों की सूची सदन के पटल पर रखने का वादा किया, जिन्होंने वंदेमातरम् न गाने या विरोध करने का बयान दिया है या संसद में गान के वक्त बाहर चले जाते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वंदेमातरम् का प्रभाव
अमित शाह ने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी वंदेमातरम् ने हमारे आजादी के आंदोलन को गति देने का काम किया। श्यामजी कृष्ण वर्मा, मैडम भीकाजी कामा और वीर सावरकर ने जो भारत का त्रिवर्ण ध्वज निर्मित किया था, उस पर स्वर्णिम अक्षर में एक ही नाम था – वंदेमातरम्।
उन्होंने 1936 के बर्लिन ओलंपिक्स का उदाहरण दिया, जब गुलामी के कालखंड में भी हमारी हॉकी की टीम को उत्साह और प्रेरणा की जरूरत थी। कोच ने लाइन में खड़े कर भावपूर्ण तरीके से वंदेमातरम् का ध्यान किया और हम गोल्ड मेडल जीत कर आए।
भाजपा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
गृहमंत्री ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी की रचना ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के आधार पर हुई है। हमारी पार्टी मानती है कि यह देश अपनी मूल संस्कृति और मूल विचारों के आधार पर चलना चाहिए, पाश्चात्य संस्कृति के आधार पर नहीं।
उन्होंने कहा कि इस संसद में वंदेमातरम् के गान को बंद करा दिया गया था। 1992 में भाजपा सांसद श्री राम नायक ने एक शॉर्ट ड्यूरेशन डिस्कशन के माध्यम से वंदेमातरम् को संसद में फिर से गाने की शुरुआत करने के लिए एक मुद्दा उठाया। उस वक्त प्रतिपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी जी ने बहुत प्रमुखता के साथ लोकसभा के स्पीकर को कहा कि इस महान सदन के अंदर वंदेमातरम् का गान होना चाहिए क्योंकि संविधान सभा ने इसको स्वीकारा है। फिर लोकसभा ने सर्वानुमत से 1992 में वंदेमातरम् के गान की शुरुआत की।
उन्होंने दावा किया कि जब वंदेमातरम् के गान की शुरुआत हो रही थी, तब भी ढेर सारे लोगों ने कहा था कि हम वंदेमातरम् नहीं गाएंगे। उन्होंने अपनी आंखों से देखा है कि कई सारे सदस्य वंदेमातरम् होता है तो गान के पहले संसद में बैठे होते हैं तो भी खड़े होकर बाहर चले जाते हैं। उन्होंने विश्वास से कहा कि भारतीय जनता पार्टी का एक भी सदस्य वंदेमातरम् के गान के वक्त सम्मान के साथ खड़ा न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता।
सरकार द्वारा 150वीं वर्षगांठ का भव्य आयोजन
अमित शाह ने बताया कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी की 130वीं जयंती पर हमारी सरकार ने डाक विभाग ने एक स्टैंप जारी किया। स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में हर घर तिरंगा का अभियान भी हमने कराया और उस वक्त हमारे प्रधानमंत्री जी ने जनता का आह्वान किया था कि तिरंगा फहराते वक्त वंदेमातरम् बोलना नहीं भूलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वंदेमातरम् की 150वीं वर्षगांठ को भी भारत सरकार बहुत अच्छे तरीके से मनाने का तय किया है। 1 अक्टूबर 2025 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पूरा वर्ष वंदेमातरम् के यशोगान में मनाया जाएगा, इसका प्रस्ताव पारित किया। 24 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित कार्यक्रमों की रूपरेखा तय की गई। माननीय प्रधानमंत्री जी ने भारत माता को पुष्पांजलि देकर 7 नवंबर 2025 को नई दिल्ली में इस वर्ष का शुभारंभ किया।
विभिन्न कार्यक्रम और पहल
इस वर्षगांठ के उपलक्ष्य में कई चरणों में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं: चरण एक नवंबर में हो चुका है, चरण दो जनवरी 2026 में होगा, चरण तीन अगस्त 2026 में होगा और चरण चार नवंबर 2026 में होगा। स्मारक डाक टिकट और सिक्का भी जारी किया जा चुका है।
‘वंदेमातरम् नाद एकम रूप अनेकम’ ऐसे शीर्षक से 75 वादकों द्वारा विशेष सांस्कृतिक प्रस्तुतीकरण की रचना भी हो चुकी है। 7 नवंबर को सुबह 10:00 बजे देश भर में सामूहिक वंदेमातरम् का गान भी भारत सरकार के आह्वान पर देश की जनता ने किया।
वंदेमातरम् के 150 वर्ष पर डॉक्यूमेंट्री और प्रदर्शनी बनाई गई है, जिसे हर जिला सेंटर पर और हो सके तो तहसील सेंटर पर दिखाया जाएगा। डिजिटल मोड पर करोड़ों लोगों को वह प्रदर्शनी भी भेजी जाएगी। ऑल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन और एफएम चैनलों पर विशेष कार्यक्रमों को प्रसारित करने का आयोजन किया गया है। प्रेस सूचना ब्यूरो द्वारा टायर-2 और टायर-3 शहरों में चर्चा सभाएं का आयोजन होने वाला है। सभी भारतीय दूतावासों में वंदेमातरम् आधारित सांस्कृतिक संध्याएं आयोजित होने वाली हैं।
‘वंदेमातरम् सैल्यूट टू मदर अर्थ’ के तहत वृक्षारोपण अभियान चालू है। हाईवे पर देशभक्ति आधारित वंदेमातरम् के इतिहास को दर्शाते हुए चित्र भी रखे जाएंगे। रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डों पर एलईडी डिस्प्ले के माध्यम से सार्वजनिक घोषणा भी होगी। वंदेमातरम् और बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी पर 25 लघु फिल्में (एक-एक मिनट की) बनाने की भी शुरुआत हो चुकी है।
अमृत काल और वंदेमातरम् का भविष्य
गृहमंत्री ने देश के प्रधानमंत्री जी द्वारा लाल किले से अमृत काल के लिए घोषित पंच प्रण का भी जिक्र किया। इसमें शामिल हैं: जब देश आजादी की शताब्दी मनाता हो, उस वक्त विकसित भारत का लक्ष्य तय करना; गुलामी की हर मानसिकता से मुक्ति प्राप्त करना; अपनी विरासत पर गर्व लेना; देश की एकता, एकजुटता और अखंडता को संभाल कर रखना; और नागरिकों में कर्तव्य की भावना को आगे बढ़ाना।
उन्होंने बताया कि जब देश की आजादी के 75 साल हुए, कोरोना काल होने के बावजूद 2 साल तक पूरे देश के हर गांव-गांव में आजादी के अमृत महोत्सव को मनाया गया। अमृत महोत्सव के माध्यम से इस देश की युवा पीढ़ी को हमारी 1857 से 1947 तक की पूरी आजादी के संघर्ष से परिचित कराया गया। कई नामी और अनामी स्वतंत्रता संग्राम के नायकों को ढूंढकर उनके स्मारक बनाए गए, देश भर में कई कार्यक्रम हुए और देशभक्ति का एक नया ज्वार खड़ा करने का प्रयास आजादी के बाद पहली बार हुआ।
प्रधानमंत्री जी ने अमृत काल का विचार रखा है, जो आजादी के 75 से 100 साल का कालखंड है। इसे देश को महान बनाने का कालखंड के रूप में चुनौती के रूप में लिया जाएगा। जब आजादी की शताब्दी मनाई जाएगी, यह देश पूरे विश्व में हर क्षेत्र में नंबर वन पर होगा। यह संकल्प आज प्रधानमंत्री जी का अकेले का नहीं है, कोई एक पॉलिटिकल पार्टी का नहीं है, बल्कि यह संकल्प 140 करोड़ भारतीयों का संकल्प है, और यह पूरा होकर रहेगा।
उन्होंने कहा कि यह दैव योग ही है कि जब अमृत काल हम मना रहे हैं, तभी वंदेमातरम् का 150वां साल आज आया है। इसके माध्यम से हम राष्ट्रभक्ति को जगाने का काम करेंगे। वंदेमातरम् काल बाह्य कभी नहीं होगा। उसकी रचना हुई तब भी उसकी इतनी ही जरूरत थी जितनी आज है। उस जमाने में वंदेमातरम् देश को आजाद बनाने का कारण बना और अमृत काल में देश को विकसित और देश को महान बनने का नारा वंदेमातरम् बनेगा, इसका मुझे पूरा विश्वास है।
अमित शाह ने सदन में बैठे सभी सदस्यों से आह्वान किया कि यह हमारी साझी जिम्मेदारी है कि हम बच्चे-बच्चे के मन में वंदेमातरम् के संस्कार पुनर्जागृत करें, हर युवा के मन में वंदेमातरम् के नारे को स्थापित करें, हर किशोर को वंदेमातरम् की व्याख्या के रास्ते पर अपना जीवन समर्पित करने के लिए प्रेरित करें। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि वंदेमातरम् का यह उद्घोष ही हमारे आजादी के सेनानियों ने जो भारत की कल्पना की थी, वह भारत की रचना का कारण बनेगा और सदन की यह भावना हमारी युवा पीढ़ी तक विशेषकर पहुंचेगी।
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