Highlights
- पुलिस पर बच्चों और महिलाओं को बेरहमी से पीटने का आरोप।
- किसानों का दावा- उपजाऊ जमीन को बंजर बताकर फैक्ट्री को बेचा गया।
- एथेनॉल फैक्ट्री से भूजल और पर्यावरण को गंभीर खतरा।
- कंपनी पर रोजगार का झूठा सपना दिखाने और वार्ता से बचने का आरोप।
हनुमानगढ़: हनुमानगढ़ (Hanumangarh) के राठीखेड़ा गांव (Rathikheda village) में किसानों (farmers) ने पुलिस (police) पर बच्चों की हड्डियां तोड़ने और डराने का आरोप लगाया है। ड्यून एथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड (Dune Ethanol Private Limited) पर धोखाधड़ी का आरोप है, जबकि कलेक्टर (Collector) को फैक्ट्री की अनुमति की जानकारी नहीं।
हनुमानगढ़ की टिब्बी तहसील के राठीखेड़ा गांव के लोगों ने ड्यून एथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड फैक्ट्री पर गंभीर आरोप लगाए हैं। 10 दिसंबर को हुई हिंसा के बाद से 70 बीघा उपजाऊ जमीन पर फैक्ट्री का काम बंद है।
पूरे इलाके को छावनी में बदल दिया गया है और इंटरनेट सेवाएं भी बंद कर दी गई हैं। गांव में सन्नाटा पसरा हुआ है और गलियां सूनी हैं।
भास्कर ने ग्राउंड जीरो पर जाकर किसानों का पक्ष जाना और उनकी पूरी रिपोर्ट तैयार की है। बुधवार शाम को पुलिस द्वारा लगाए गए बैरिकेड्स को तोड़कर किसान आगे बढ़ गए थे।
किसानों के मुख्य आरोप: उपजाऊ जमीन को बंजर बताया और असलियत छिपाई
किसानों का पहला आरोप है कि फैक्ट्री के लिए उपजाऊ जमीन को बंजर बताकर खरीदा गया है। 100 बीघा जमीन के मालिक गुरपाल सिंह ने बताया कि जिस जगह फैक्ट्री लगाई जा रही है, वह अत्यधिक उपजाऊ है।
यहां बासमती चावल की सबसे बढ़िया किस्म पैदा होती है और पानी का स्तर भी 40 से 50 फीट पर ही है। 70 बीघा जमीन पर फैक्ट्री लगने से प्रदूषण फैलेगा और जमीन का पानी भी दूषित होगा।
किसान सालभर में दो से तीन फसलें लेते हैं, लेकिन फैक्ट्री के बाद पीने का पानी मिलना भी मुश्किल हो जाएगा। किसान बलराम सहारण ने आरोप लगाया कि जमीन को बंजर बताकर फैक्ट्री मालिकों के नाम किया गया।
जमीन कंपनी को देने से पहले दो बार अलग-अलग लोगों के नाम की गई थी। जमीन को दो साल काश्त के लिए ठेके पर भी दिया गया था।
फैक्ट्री के लिए जमीन का इस्तेमाल किस तरह की फैक्ट्री लगाने के लिए किया जाएगा, यह भी किसानों से छिपाया गया। इस जमीन पर वर्तमान में चार नलकूप लगे हैं और बिजली विभाग ने खेती के लिए बिजली दी हुई है।
ऐसी कंपनियों को आबादी क्षेत्र से बाहर लगाने का प्रावधान है, जबकि यह जमीन राठीखेड़ा के वार्ड 1 में स्थित है। इसके आसपास 5 किलोमीटर के दायरे में 80 से ज्यादा गांव और ढाणियां मौजूद हैं।
कंपनी के झूठे दावे: भूजल और प्रदूषण पर किसानों के सवाल
ग्रामीणों का दूसरा आरोप है कि कंपनी के प्रतिनिधियों ने दावा किया था कि फैक्ट्री से न भूजल खराब होगा और न ही प्रदूषण फैलेगा। धरने का नेतृत्व कर रहे मान सिंह राठौड़ ने बताया कि इस फैक्ट्री में एथेनॉल का उत्पादन किया जाएगा।
1 लीटर एथेनॉल के उत्पादन में 3000 से 10,000 लीटर साफ पेयजल का उपयोग किया जाता है। इस फैक्ट्री को रोज 60 लाख लीटर ताजे पानी की जरूरत पड़ेगी।
फैक्ट्री लगने से जल, जलवायु और जमीन तीनों बर्बाद हो जाएंगे, क्योंकि फैक्ट्री से निकलने वाला अपशिष्ट प्रदूषण की रेड जोन श्रेणी में आता है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि कच्चे माल के जलाने से प्रतिदिन जो 2200 क्विंटल राख (फ्लाई ऐश) निकलेगी, उसके निस्तारण के लिए भी कोई उपाय नहीं है।
फैक्ट्री की दीवार तोड़ने से पहले किसानों ने महापंचायत भी की थी। नेताओं का आरोप है कि प्रशासन ने उन्हें लिखित में फैक्ट्री का काम रोकने का आश्वासन नहीं दिया था।
रोजगार का झूठा सपना और कंपनी का विवादित इतिहास
तीसरा आरोप है कि कंपनी प्रतिनिधि ने रोजगार का झूठा सपना दिखाया। बुजुर्ग किसान महेंद्र सिंह ने कहा कि कंपनी प्रतिनिधि ने दावा किया था कि फैक्ट्री से इलाके में रोजगार आएगा, लेकिन यह इलाका तो राजस्थान के सबसे संपन्न क्षेत्रों में से एक है।
यहां यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश से लोग खेती करने आते हैं। चंडीगढ़ की इस कंपनी का एक प्लांट पंजाब के जीरा में भी था, जो प्रदूषण फैलाने के कारण बंद हो गया था।
ऐसी ही एक फैक्ट्री सूरतगढ़ के पास बड़ी नहर के साथ भोपालपुरा में भी लगी हुई है, जिसका भी लगातार स्थानीय लोग विरोध करते आ रहे हैं। स्थानीय लोगों को ऐसी फैक्ट्री में कितना रोजगार मिलता है, यह किसी से छिपा नहीं है।
ग्रामीण संदीप ने बताया कि जमीन के लिए जो एनओसी ली गई है, वह भी उनके आसपास के गांव से नहीं ली गई है। किसानों को धोखे में रखकर उनकी बेशकीमती जमीनें फैक्ट्री के नाम की गई हैं।
इलाके के रिछपाल ने बताया कि प्रशासन यह दिखा रहा है कि केवल दो-चार गांव ही फैक्ट्री लगने का विरोध कर रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि उनके गांव से महज 8-10 किमी दूर हरियाणा के सिरसा जिले के भी एक दर्जन से ज्यादा गांव और ढाणियां इसके खिलाफ हैं। बुधवार की महापंचायत में वहां के ग्रामीण भी शामिल हुए थे।
पुलिस ने उनके गांव के चारों ओर छोटी-छोटी चौकियां बनाकर डर का माहौल बनाया हुआ है।
वार्ता से इनकार और पुलिस की दमनकारी कार्रवाई
चौथा आरोप है कि कंपनी प्रतिनिधियों ने किसानों से वार्ता करने से इनकार किया। धरना प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे मान सिंह राठौड़ और बलराम सहारण ने बताया कि 16 महीने से उनका विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्वक फैक्ट्री के लिए बनाई गई कच्ची सड़क पर चल रहा था।
इस बीच कई बार उन्होंने वार्ता के लिए माहौल बनाया, लेकिन अधिकारी समय बढ़ाते रहे। संगरिया के डीएसपी ने 25 नवंबर को कंपनी के प्रतिनिधियों और प्रशासन के साथ वार्ता का आश्वासन दिया था।
लेकिन 18 नवंबर की सुबह करीब 4.30 बजे पुलिस ने उन्हें जबरन धरना स्थल से खदेड़ना शुरू कर दिया। उनके 40 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया और 450 लोगों, जिनमें करीब 250 महिलाएं शामिल थीं, को धरना स्थल से उठाकर अन्यत्र छोड़ दिया गया।
गिरफ्तार साथियों से मिलने नहीं दिया गया। उनके 4-5 साथी अब भी पुलिस हिरासत में हैं। 18 नवंबर से वे लोग टिब्बी गुरुद्वारे में धरने पर बैठे हैं। इसी धोखे से ग्रामीणों में रोष था, जो बुधवार को झड़प और आगजनी में बदल गया।
प्रदर्शनकारी किसानों ने फैक्ट्री में खड़ी गाड़ियों को फूंक दिया। कंपनी के ऑफिस को भी जलाने का आरोप किसानों पर है।
हिंसक झड़प और पुलिस पर गंभीर आरोप
ग्रामीणों ने पुलिस पर भी आरोप लगाया है। उनका कहना है कि गुस्साई भीड़ ने चार वाहनों को आग लगाई थी, जबकि कंपनी के अंदर खड़ी गाड़ियों में पुलिस कर्मियों ने ही आग लगाई है। हालांकि, भास्कर इन आरोपों की पुष्टि नहीं करता है।
बुधवार को हुई हिंसा में घायल धर्मवीर ने आरोप लगाया कि धरना शांतिपूर्वक चल रहा था। वार्ता के लगातार टलने से ग्रामीणों का सब्र टूट रहा था।
अचानक पुलिस कर्मियों ने लाठी चार्ज कर दिया। पुलिस ने न बुजुर्ग देखा, न महिला, न ही बच्चे, सबको डंडों से पीटना शुरू कर दिया। इसी के बाद भीड़ गुस्से में आ गई।
10 साल के एक बच्चे ने बताया कि वह भी मौके पर था, जब उसे पकड़कर एक कमरे में बंद कर दिया गया। वहां पुलिस वालों ने उसे डंडे से मारा, जिससे उसके कूल्हे की हड्डी में चोट आई है।
बुजुर्ग महिला कंवरदीप कौर की कलाई और पैर में चोट आई है। प्लास्टर बंधे होने के बाद भी वह धरने पर बैठी हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पुरुष पुलिस कर्मियों ने महिलाओं और बच्चों को बुरी तरह पीटा है।
किसी के हाथ-पांव में फ्रैक्चर है तो किसी के सिर में चोट लगी है। कई अब भी अस्पताल में भर्ती हैं। ऐसे ही प्रेम को भी हाथ-पैर में फ्रैक्चर है।
फैक्ट्री विरोध में शामिल गांव
पूरी टिब्बी तहसील, राठीखेड़ा, रत्ताखेड़ा, सूरेवाला, मसानी, पीर का मढ़ीया, थेड्खुर्द, 2जेजेआर, ढाणी प्यार सिंह वाली, तलवाड़ा झील, सिलवाडा खुर्द, बेहरवाला कलां, 5जेजेआर।
प्रशासन का पक्ष: कलेक्टर और एडीजे के बयान
कलेक्टर खुशाल यादव का बयान
कलेक्टर खुशाल यादव का कहना है कि यह मामला साल 2024 से चल रहा है। ग्रामीणों और किसानों का धरना भी लंबे समय से जारी है।
धारा 144 (अब 163) के बावजूद उन्होंने किसानों-ग्रामीणों को महापंचायत की अनुमति दी थी। बुधवार को प्रदर्शन कर रहे लोगों में से युवाओं का एक धड़ा अलग होकर उग्र रूप से आगे बढ़ा।
उन पर नेताओं का नियंत्रण नहीं रहा, और यहीं से चीजें बिगड़ना शुरू हो गईं। उन्होंने यह भी बताया कि फैक्ट्री अभी शुरू नहीं हुई है।
एडीजे वीके सिंह का बयान
एडीजे वीके सिंह ने बताया कि आंदोलनकारियों के नेताओं ने जो भड़काऊ भाषण दिए, उससे लोगों को उकसावा मिला। उनके पास जो फीडबैक है, उसमें हरियाणा और पंजाब से भी लोग इस उपद्रव में शामिल थे।
सभी के अपने-अपने एजेंडे हैं। स्थानीय लोगों को फैक्ट्री लगने से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन वे आंदोलन कर रहे लोगों जितने मुखर नहीं हैं।
यह घटना हनुमानगढ़ में किसानों और पुलिस के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाती है, जहां एक एथेनॉल फैक्ट्री के निर्माण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। किसानों के आरोप और प्रशासन के स्पष्टीकरण के बीच, क्षेत्र में शांति बहाली एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
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