Highlights
- जालोर सीएमएचओ पर चहेती फर्म को टेंडर देकर 50 लाख का नुकसान पहुंचाने का आरोप।
- 10 हजार रुपए का हीमोग्लोबिन मीटर 28 हजार रुपए की महंगी दर पर खरीदा गया।
- प्रेग्नेंसी किट की सप्लाई में मैन्युफेक्चरिंग डेट और डिलीवरी तारीख में बड़ी गड़बड़ी मिली।
- नियमों के विरुद्ध जाकर जैम पोर्टल के बजाय ऑफलाइन कार्यादेश जारी किए गए।
जालोर | राजस्थान के जालोर जिले में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के भीतर एक बहुत बड़ा भ्रष्टाचार का मामला उजागर हुआ है। इस घोटाले के केंद्र में जालोर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. भैराराम जाणी का नाम सामने आया है।
भ्रष्टाचार का मुख्य आरोप
आरोप है कि डॉ. भैराराम जाणी ने अजमेर की एक विशेष फर्म को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए सरकारी नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाईं। इस प्रक्रिया में उन्होंने न केवल टेंडर नियमों का उल्लंघन किया बल्कि सरकारी धन का भी दुरुपयोग किया है।इस पूरे प्रकरण के कारण राज्य सरकार को लगभग 50 लाख रुपए का सीधा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों से इस पूरे भ्रष्टाचार की परतें एक-एक करके खुली हैं।
उपकरणों की कीमतों में भारी अंतर
जांच में सामने आया है कि सरकारी अस्पतालों के लिए खरीदे गए उपकरण बाजार की वास्तविक दरों से कई गुना अधिक कीमत पर खरीदे गए। हीमोग्लोबिन मीटर जिसकी वास्तविक कीमत लगभग 10 हजार रुपए है उसे 28 हजार रुपए में खरीदा गया।इसी प्रकार जो ग्लूकोमीटर अन्य जिलों में 3750 रुपए में उपलब्ध था उसे जालोर में 9500 रुपए की दर से खरीदा गया है। इस भारी अंतर ने स्वास्थ्य विभाग की खरीद प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विभिन्न मदों में सरकारी नुकसान का ब्यौरा
ग्लूकोमीटर की खरीद में जालोर और बाड़मेर की दरों में जमीन आसमान का अंतर देखने को मिला है। बाड़मेर में यह दर 3750 रुपए थी जबकि जालोर में इसे 9500 रुपए में खरीदा गया जिससे 13 लाख रुपए से अधिक का नुकसान हुआ।हीमोग्लोबिन मीटर की खरीद में भी इसी तरह की अनियमितता बरती गई है। बाड़मेर की 10150 रुपए की दर के मुकाबले जालोर में 28000 रुपए चुकाए गए जिससे सरकार को 15 लाख रुपए से ज्यादा की चपत लगी।
प्रेग्नेंसी टेस्ट किट में भारी हेरफेर
सबसे चौंकाने वाला मामला प्रेग्नेंसी टेस्ट किट की खरीद में सामने आया है। जैसलमेर जिले में जो किट मात्र 6.5 रुपए में खरीदी गई उसे जालोर में 25 रुपए की दर पर खरीदा गया है।इस एक आइटम की खरीद से ही सरकार को 16 लाख 18 हजार रुपए से अधिक का नुकसान झेलना पड़ा है। इसके अलावा यूरिन स्ट्रिप और एचबीएसएजी टेस्ट किट की खरीद में भी लाखों रुपए का गबन किया गया है।




नियमों के विरुद्ध टेंडर प्रक्रिया
सीएमएचओ डॉ. भैराराम जाणी ने वीर्य विश्लेषण परीक्षण किट की श्रेणी में टेंडर जारी करने की अनुमति ली थी। लेकिन वास्तविक खरीद के दौरान इसमें आयोडीन टेस्ट किट और मलेरिया टेस्ट किट सहित 45 अन्य सामान शामिल कर लिए गए।जालोर सीएमएचओ ने 12 मार्च 2025 को जैम पोर्टल के माध्यम से एक टेंडर निकाला था। इस टेंडर में उन सामानों को भी शामिल किया गया जो पोर्टल पर सामान्य श्रेणी में पहले से ही कम कीमतों पर उपलब्ध थे।
विभाग को गुमराह करने का प्रयास
सरकारी नियमों के अनुसार जो वस्तुएं जैम पोर्टल पर उपलब्ध होती हैं उनके लिए अलग से टेंडर जारी नहीं किया जा सकता। सीएमएचओ ने वीर्य विश्लेषण किट की आड़ लेकर विभाग के उच्चाधिकारियों को गुमराह किया और चहेती फर्म को काम सौंप दिया।टेंडर प्रक्रिया में केवल ओईएम द्वारा अधिकृत विक्रेताओं को ही भाग लेने की अनुमति दी जानी चाहिए थी। हालांकि डॉ. जाणी ने बिना आवश्यक प्रमाण पत्रों के ही अजमेर की फर्म को पात्र घोषित कर दिया।
प्रमाण पत्रों की अनदेखी
निविदा की शर्तों के अनुसार विक्रेता को ओईएम प्राधिकरण और गैर-दोषसिद्ध प्रमाण पत्र अपलोड करने अनिवार्य थे। संबंधित कंपनी ने केवल 15 आइटम के ही प्रमाण पत्र जमा किए थे फिर भी उसे कार्यादेश जारी कर दिया गया।टेंडर प्रक्रिया के दौरान तकनीकी मूल्यांकन से पहले ही सैंपल मांगने का भी आरोप लगा है। जैम पोर्टल के नियमों के अनुसार केवल न्यूनतम बोली लगाने वाली फर्म से ही बाद में नमूने मांगे जा सकते हैं।
सप्लाई और मैन्युफेक्चरिंग में फर्जीवाड़ा
प्रेग्नेंसी टेस्ट किट की सप्लाई में तो जालसाजी की सारी हदें पार कर दी गई हैं। दस्तावेजों में इन किट की सप्लाई 31 मार्च 2025 को दिखाई गई है जबकि उन पर मैन्युफेक्चरिंग डेट मई 2025 अंकित है।जब यह गड़बड़ी पकड़ी गई तो सरकारी रजिस्टर में कांटछांट कर सप्लाई की तारीख को बदलकर 10 मई 2025 कर दिया गया। हैरानी की बात यह है कि इस सामान का बिल मार्च महीने में ही पास कर दिया गया था।
ऑफलाइन टेंडर का अवैध खेल
यूरिन स्ट्रिप की सप्लाई के मामले में भी भारी कमी पाई गई है। निर्धारित मात्रा से लगभग 1 लाख 13 हजार स्ट्रिप कम प्राप्त हुई जिससे सरकार को 6 लाख रुपए से अधिक का नुकसान हुआ।जांच में यह भी पता चला कि सीएमएचओ ने जैम पोर्टल की ऑनलाइन प्रक्रिया को बीच में ही छोड़कर ऑफलाइन कार्यादेश जारी कर दिए थे। यह पूरी तरह से प्रशासनिक नियमों और पारदर्शिता के सिद्धांतों के खिलाफ है।
सीएमएचओ का गोलमोल जवाब
जब इस भ्रष्टाचार के संबंध में सीएमएचओ डॉ. भैराराम जाणी से सवाल पूछे गए तो उन्होंने सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने दावा किया कि सभी खरीद नियमों के अनुसार की गई है और कोई अनियमितता नहीं हुई।उन्होंने विभाग द्वारा की गई किसी भी जांच की जानकारी होने से भी इनकार कर दिया। जबकि आरटीआई से प्राप्त दस्तावेज और जांच रिपोर्ट स्पष्ट रूप से उनके दावों के विपरीत सबूत पेश कर रहे हैं।
जांच कमेटी की रिपोर्ट
इस पूरे मामले की शिकायत एक अन्य फर्म ने जयपुर स्थित चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के वित्तीय सलाहकार से की थी। शिकायत के बाद जोधपुर जोन के अधिकारियों की एक तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित की गई थी।इस कमेटी ने सितंबर 2025 में अपनी विस्तृत रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को सौंप दी थी। रिपोर्ट में टेंडर प्रक्रिया और खरीद दरों में भारी अनियमितताओं की पुष्टि की गई है।
सार्वजनिक धन की लूट पर सवाल
इस घोटाले ने राजस्थान के स्वास्थ्य विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ों को उजागर कर दिया है। जनता के टैक्स के पैसे का इस तरह से दुरुपयोग होना बेहद चिंताजनक विषय है।स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस मामले में दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। अब देखना यह है कि सरकार इस स्पष्ट भ्रष्टाचार पर क्या कदम उठाती है।
प्रशासनिक पारदर्शिता की आवश्यकता
सरकारी खरीद में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए जैम पोर्टल जैसे सिस्टम बनाए गए हैं। लेकिन जब जिम्मेदार अधिकारी ही इन सिस्टमों में सेंध लगाने लगें तो पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।जालोर का यह मामला भविष्य के लिए एक सबक है कि किस प्रकार तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर भ्रष्टाचार को अंजाम दिया जा सकता है। इस मामले में कड़ी कार्रवाई ही अन्य भ्रष्ट अधिकारियों के लिए एक चेतावनी साबित होगी।
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