राजस्थान की आत्मा पर संकट: बीकानेर में खेजड़ी बचाओ आंदोलन ने पकड़ा तूल, प्रताप सिंह खाचरियावास ने सरकार को दी बड़ी चेतावनी

बीकानेर में खेजड़ी बचाओ आंदोलन ने पकड़ा तूल, प्रताप सिंह खाचरियावास ने सरकार को दी बड़ी चेतावनी
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Highlights

  • खेजड़ी बचाओ आंदोलन अब बना जन आंदोलन
  • प्रताप सिंह खाचरियावास ने सरकार को घेरा
  • खेजड़ी को बताया राजस्थान की आत्मा और संस्कृति का प्रतीक
  • नियमों को कमजोर करने का लगाया आरोप।

बीकानेर | राजस्थान के बीकानेर से शुरू हुआ 'खेजड़ी बचाओ' आंदोलन अब एक व्यापक जन आंदोलन का रूप ले चुका है। पिछले दो दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे आंदोलनकारियों को अब विभिन्न राजनीतिक हस्तियों का पुरजोर समर्थन मिल रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और आरएलपी सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल के बाद अब कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रताप सिंह खाचरियावास ने भी इस मुहिम को अपना समर्थन देते हुए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

प्रताप सिंह खाचरियावास ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि खेजड़ी केवल एक वृक्ष नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की आत्मा और हमारी गौरवशाली संस्कृति का प्रतीक है। खाचरियावास ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि पेड़ों की अंधाधुंध कटाई पर रोक नहीं लगाई गई और नियमों में ढिलाई जारी रही, तो कांग्रेस इस आंदोलन को पूरे प्रदेश में और अधिक उग्र करेगी। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने वृक्षों की सुरक्षा के लिए बने सख्त कानूनों को कमजोर कर दिया है, जिससे प्रदेश का पारिस्थितिक तंत्र खतरे में है।

खाचरियावास ने खेजड़ी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह वृक्ष राजस्थान के जीवन चक्र का आधार है। उन्होंने बताया कि खेजड़ी की पत्तियां और लूम पशुओं के लिए मुख्य आहार हैं, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करते हैं। इसकी सूखी टहनियां ईंधन के काम आती हैं और यह वृक्ष बिना नष्ट हुए बार-बार पनपने की अद्भुत क्षमता रखता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि खेजड़ी को सुरक्षित रखना केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं है, बल्कि राजस्थान की परंपराओं और सुकून को बचाना है।

सरकार के विकास मॉडल पर सवाल उठाते हुए खाचरियावास ने कहा कि विकास के नाम पर पर्यावरण के सबसे बड़े संरक्षक को नष्ट करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने मांग की कि सरकार तुरंत अपने रुख में बदलाव करे और खेजड़ी के संरक्षण के लिए कड़े कदम उठाए। वर्तमान में इस आंदोलन को मिल रहे व्यापक जनसमर्थन ने प्रशासन की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

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