जयपुर | नीरजा मोदी स्कूल में छात्रा अमायरा के आत्महत्या मामले में सीबीएसई की ओर से स्कूल की मान्यता रद्द करने के निर्णय पर अब विवाद गहरा गया है। राजस्थान के विभिन्न निजी स्कूल संगठनों ने सीबीएसई के इस फैसले के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। स्कूल संगठनों का तर्क है कि यह निर्णय न्यायसंगत नहीं है और इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए क्योंकि इससे हजारों परिवारों पर सीधा असर पड़ रहा है।
नीरजा मोदी स्कूल विवाद: नीरजा मोदी स्कूल की मान्यता रद्द करने पर विवाद, स्कूल संगठनों और अभिभावकों ने उठाए सवाल
नीरजा मोदी स्कूल में छात्रा के सुसाइड के बाद सीबीएसई द्वारा स्कूल की मान्यता रद्द करने के फैसले का विरोध शुरू हो गया है। निजी स्कूल संगठनों और अभिभावकों ने 5500 बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता जताई है।
HIGHLIGHTS
- सीबीएसई द्वारा नीरजा मोदी स्कूल की मान्यता रद्द करने का विरोध। निजी स्कूल संगठनों ने फैसले को वापस लेने की मांग की। अभिभावकों ने 5500 बच्चों के भविष्य पर जताई गहरी चिंता। शिक्षा निदेशालय ने स्कूल प्रशासन को 6 जनवरी को किया तलब।
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अभिभावकों की चिंता और बच्चों का भविष्य
सीबीएसई के इस कड़े निर्णय से स्कूल में पढ़ रहे करीब 5500 बच्चों के अभिभावक बेहद चिंतित हैं। अभिभावकों का कहना है कि छात्रा की मृत्यु एक दुखद घटना है और उनके प्रति उनकी पूरी संवेदना है। लेकिन स्कूल की किसी संभावित गलती की सजा हजारों निर्दोष बच्चों को देना किसी भी तरह से उचित नहीं है। अभिभावकों ने सवाल उठाया है कि सत्र के बीच में इन बच्चों के भविष्य और उनकी पढ़ाई का क्या होगा।
स्कूल संगठनों का कड़ा रुख
स्कूल संगठनों ने इस आदेश को भावनात्मक दबाव में लिया गया प्रशासनिक फैसला करार दिया है। उनका कहना है कि कानून को हादसे और लापरवाही के बीच स्पष्ट अंतर करना चाहिए। स्कूल क्रांति संगठन की प्रदेशाध्यक्ष हेमलता शर्मा ने उदाहरण देते हुए कहा कि झालावाड़ के सरकारी स्कूल में छत गिरने से 7 बच्चों की मौत हुई थी, लेकिन वहां किसी की मान्यता रद्द नहीं की गई। उन्होंने मांग की है कि नियम सभी के लिए समान होने चाहिए और कार्रवाई भी पक्षपातरहित हो।
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प्रशासनिक कार्रवाई और आगामी कदम
संगठनों का मानना है कि यदि हर हादसे पर स्कूल की मान्यता रद्द की जाएगी तो देश का कोई भी शिक्षण संस्थान सुरक्षित महसूस नहीं करेगा। सीबीएसई का मुख्य उद्देश्य बच्चों की शिक्षा की रक्षा करना होना चाहिए न कि उसे एक झटके में खत्म कर देना। इस बीच शिक्षा निदेशालय ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए स्कूल प्रशासन को छह जनवरी को अपना पक्ष रखने के लिए तलब किया है। अब सभी की नजरें सरकार और सीबीएसई के अगले कदम पर टिकी हैं कि क्या इस फैसले पर पुनर्विचार किया जाएगा।
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