राजस्थान: मंत्री-अफसरों में टकराव: राजस्थान में ब्यूरोक्रेसी बनाम जनप्रतिनिधि: क्यों मंत्री और सांसदों की नहीं सुन रहे IAS-IPS?

राजस्थान में ब्यूरोक्रेसी बनाम जनप्रतिनिधि: क्यों मंत्री और सांसदों की नहीं सुन रहे IAS-IPS?
Rajasthan Officer and IAS
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Highlights

  • वन मंत्री संजय शर्मा और सीकर कलेक्टर के बीच बैठक में तीखी बहस हुई।
  • केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने जोधपुर एसपी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
  • सांसद मन्नालाल रावत ने प्रतापगढ़ कलेक्टर पर सरकारी आदेशों की अवहेलना का आरोप लगाया।
  • विशेषज्ञों के अनुसार पसंदीदा अधिकारियों की नियुक्ति और कार्यशैली को लेकर यह टकराव बढ़ रहा है।

जयपुर | राजस्थान में इन दिनों सत्ता के गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई है। यह बहस जनप्रतिनिधियों और नौकरशाही के बीच बढ़ते फासले को लेकर है। राज्य में पिछले कुछ महीनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां मंत्रियों और सांसदों ने सार्वजनिक मंचों पर अधिकारियों के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर की है। यह तनाव केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा है बल्कि अब पत्र और शिकायतों के रूप में मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंच रहा है। हाल के दिनों में राजस्थान सरकार के मंत्रियों और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के बीच हुए विवादों ने शासन व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि अधिकारी उनकी बातों को अनसुना कर रहे हैं और सरकार के निर्देशों की पालना नहीं की जा रही है।

राजस्थान सरकार में वन एवं पर्यावरण मंत्री संजय शर्मा और सीकर कलेक्टर मुकुल शर्मा के बीच हुआ विवाद सबसे ताजा उदाहरण है। दिसंबर के अंतिम सप्ताह में एक सेवा शिविर के दौरान मंत्री ने कलेक्टर को खरी-खोटी सुनाई। मंत्री का कहना था कि अधिकारी अपनी मनमर्जी कर रहे हैं और जनता के कार्यों में लापरवाही बरत रहे हैं। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया। मंत्री ने साफ तौर पर कहा कि अगर अधिकारी इसी तरह काम करेंगे तो वह सीधे मुख्यमंत्री से इसकी शिकायत करेंगे। इस विवाद ने यह साफ कर दिया है कि मंत्रियों और अधिकारियों के बीच समन्वय की भारी कमी है।

सीकर में मंत्री और कलेक्टर के बीच तीखी बहस

सीकर के शहरी सेवा शिविर में जब मंत्री संजय शर्मा पहुंचे तो वहां की अव्यवस्था देखकर उनका पारा चढ़ गया। उन्होंने देखा कि कई कर्मचारी अपनी कुर्सियों से नदारद थे और जनता के काम अटके हुए थे। जब मंत्री ने अधिकारियों से जवाब मांगा तो उन्हें संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। इस पर जब जिला कलेक्टर ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों का पक्ष लेने की कोशिश की तो मंत्री और अधिक नाराज हो गए। उन्होंने कलेक्टर से कहा कि वह चोरों को संरक्षण न दें। इस घटना के बाद मंत्री नाराज होकर जयपुर लौट आए। सूत्रों का कहना है कि इस मामले की रिपोर्ट मुख्यमंत्री कार्यालय को भेज दी गई है और कलेक्टर के तबादले पर विचार किया जा रहा है।

सांसद मन्नालाल रावत और प्रतापगढ़ कलेक्टर का विवाद

केवल राज्य सरकार के मंत्री ही नहीं बल्कि सांसद भी नौकरशाही से परेशान नजर आ रहे हैं। उदयपुर के सांसद मन्नालाल रावत और प्रतापगढ़ जिला कलेक्टर अंजलि राजौरिया के बीच का विवाद भी काफी चर्चा में रहा है। सांसद का आरोप है कि कलेक्टर भारत सरकार और राज्य सरकार के स्पष्ट आदेशों की अवहेलना कर रही हैं। सांसद ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर शिकायत की है कि खनन क्षेत्र के विकास के लिए स्वीकृत 54 कार्यों में से केवल तीन पर ही अमल किया गया है। यह मामला प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना के तहत फंड के उपयोग से जुड़ा है। सांसद का कहना है कि जब केंद्र सरकार के नियम स्पष्ट हैं तो अधिकारी अपनी मर्जी कैसे चला सकते हैं।

केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की नाराजगी

ब्यूरोक्रेसी और नेताओं के बीच तकरार का एक बड़ा मामला जोधपुर से सामने आया है। केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने जोधपुर ग्रामीण एसपी के खिलाफ मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है। मंत्री का आरोप है कि एसपी ने उनके कार्यालय द्वारा बार-बार संपर्क किए जाने के बावजूद कोई जवाब नहीं दिया। प्रोटोकॉल और सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के लिए बुलाई गई बैठकों में भी अधिकारी नहीं पहुंचे। केंद्रीय मंत्री ने इसे अनुशासनहीनता करार देते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की है। हालांकि इस मामले में दिलचस्प मोड़ तब आया जब सरकार ने संबंधित आईपीएस अधिकारी को पदोन्नति दे दी। इससे यह संदेश गया कि सरकार और संगठन के बीच अधिकारियों को लेकर अलग-अलग राय हो सकती है।

जयपुर सांसद मंजू शर्मा का औचक निरीक्षण

राजधानी जयपुर में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। जयपुर सांसद मंजू शर्मा ने हाल ही में आमेर और हवामहल जोन के शिविरों का औचक निरीक्षण किया। वहां उन्हें लोगों ने बताया कि उनकी फाइलें महीनों से लंबित हैं और पट्टे जारी नहीं किए जा रहे हैं। सांसद ने मौके पर मौजूद अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई और कहा कि वे जनता की सेवा के लिए नियुक्त किए गए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अधिकारियों को अपने पद की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए और जनता के कार्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए। सांसद ने कहा कि यदि अधिकारी काम नहीं करना चाहते तो उन्हें पद छोड़ देना चाहिए।

टकराव के पीछे के मुख्य कारण

राजनीतिक विशेषज्ञों और प्रशासनिक मामलों के जानकारों का मानना है कि इस टकराव के पीछे कई गहरे कारण हैं। सबसे बड़ा कारण विभागों में मनपसंद अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर खींचतान है। मंत्री चाहते हैं कि उनके विभाग में ऐसे अधिकारी हों जो उनके निर्देशों का बिना किसी सवाल के पालन करें। वहीं दूसरी ओर आईएएस और आईपीएस अधिकारी नियमों और प्रक्रियाओं का हवाला देते हुए कई बार मंत्रियों की इच्छा के विरुद्ध निर्णय लेते हैं। इसके अलावा क्षेत्रीय राजनीति और वर्चस्व की लड़ाई भी इस विवाद को हवा देती है। जब जनप्रतिनिधियों को लगता है कि उनकी पकड़ कमजोर हो रही है तो वे अधिकारियों को निशाना बनाते हैं।

ऐतिहासिक संदर्भ और पूर्ववर्ती सरकारों के विवाद

राजस्थान में जनप्रतिनिधियों और अफसरों के बीच यह टकराव कोई नई बात नहीं है। पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार के समय भी ऐसे कई मामले सामने आए थे। तत्कालीन कृषि मंत्री लालचंद कटारिया और आईएएस दिनेश कुमार के बीच का विवाद काफी समय तक सुर्खियों में रहा था। इसी तरह परिवहन मंत्री रहे प्रताप सिंह खाचरियावास और अधिकारी राजेश्वर सिंह के बीच भी तीखी बयानबाजी हुई थी। राजस्थान की राजनीति में यह परंपरा रही है कि जब भी नई सरकार आती है तो नौकरशाही के साथ तालमेल बिठाने में उसे समय लगता है। हालांकि वर्तमान सरकार में यह टकराव कुछ ज्यादा ही मुखर होकर सामने आ रहा है।

मुख्य सचिव के निर्देश और वर्तमान स्थिति

प्रशासनिक सेवाओं में सुधार और जनप्रतिनिधियों के सम्मान को सुनिश्चित करने के लिए मुख्य सचिव समय-समय पर परिपत्र जारी करते रहते हैं। इन निर्देशों में स्पष्ट कहा गया है कि अधिकारियों को विधायकों और सांसदों की बातों को गंभीरता से सुनना चाहिए और उनके प्रोटोकॉल का पालन करना चाहिए। इसके बावजूद जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। अधिकारियों का तर्क होता है कि वे नियमों से बंधे हैं जबकि नेताओं का कहना है कि नियम जनता की सुविधा के लिए होने चाहिए न कि बाधा डालने के लिए। यह वैचारिक मतभेद ही अक्सर विवाद का रूप ले लेता है।

जनता पर पड़ने वाला प्रभाव

मंत्री और अफसरों के इस झगड़े में सबसे ज्यादा नुकसान आम जनता का होता है। जब शासन के दो प्रमुख अंग आपस में ही उलझे रहेंगे तो विकास कार्य ठप हो जाते हैं। योजनाओं का क्रियान्वयन धीमा हो जाता है और जनता की शिकायतों का निवारण नहीं हो पाता। सीकर और जयपुर के शिविरों में जो हुआ वह इसी का परिणाम है। यदि अधिकारी और नेता मिलकर काम नहीं करेंगे तो सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि मुख्यमंत्री को इस मामले में हस्तक्षेप कर दोनों पक्षों के बीच संवाद स्थापित करना चाहिए।

निष्कर्ष और भविष्य की राह

राजस्थान में ब्यूरोक्रेसी और जनप्रतिनिधियों के बीच का यह संघर्ष लोकतंत्र के लिए एक चुनौती है। शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए दोनों के बीच विश्वास और सहयोग का होना अनिवार्य है। अधिकारियों को चाहिए कि वे जनप्रतिनिधियों की शिकायतों को संवेदनशीलता से सुनें और जनप्रतिनिधियों को भी प्रशासनिक सीमाओं का सम्मान करना चाहिए। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के लिए यह एक बड़ी परीक्षा है कि वे किस तरह इस टकराव को रोककर एक पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन प्रदान करते हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार अधिकारियों के खिलाफ कोई सख्त कदम उठाती है या फिर यह विवाद इसी तरह चलता रहेगा।

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