Highlights
- एसओजी ने राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड के तत्कालीन तकनीकी प्रमुख संजय माथुर को गिरफ्तार किया है।
- सुपरवाइजर, प्रयोगशाला सहायक और कृषि पर्यवेक्षक भर्ती 2018 में हुआ बड़ा फर्जीवाड़ा।
- फोटोशॉप के जरिए ओएमआर शीट्स में सही उत्तर भरकर बढ़ाए गए अभ्यर्थियों के अंक।
- जांच समिति में भी आरोपियों को शामिल कर साक्ष्य दबाने की कोशिश की गई थी।
जयपुर | राजस्थान में सरकारी नौकरी की राह देख रहे लाखों युवाओं के साथ हुए एक बड़े विश्वासघात का खुलासा हुआ है। राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड (RSMSSB) द्वारा वर्ष 2018 में आयोजित की गई तीन प्रमुख भर्ती परीक्षाओं में बड़े स्तर पर फर्जीवाड़ा सामने आया है। स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (एसओजी) ने इस मामले में बोर्ड के तत्कालीन तकनीकी प्रमुख संजय माथुर सहित पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है। इन परीक्षाओं में अयोग्य अभ्यर्थियों को चयनित कराने के लिए ओएमआर शीट्स और डिजिटल डेटा के साथ छेड़छाड़ की गई थी।
इन तीन भर्तियों में हुआ फर्जीवाड़ा
एसओजी की जांच के अनुसार, सुपरवाइजर (महिला अधिकारिता) सीधी भर्ती परीक्षा-2018, प्रयोगशाला सहायक भर्ती परीक्षा-2018 और कृषि पर्यवेक्षक भर्ती परीक्षा-2018 में लाखों रुपये लेकर अंकों में हेरफेर किया गया। एडीजी विशाल बंसल ने बताया कि आरोपियों ने परिणाम तैयार करने के दौरान कंप्यूटर सिस्टम में सेंध लगाई और चुनिंदा अभ्यर्थियों के अंक अवैध रूप से बढ़ा दिए। अब तक ऐसे 38 अभ्यर्थियों की पहचान की जा चुकी है, जिनमें से कई वर्तमान में विभिन्न विभागों में कार्यरत हैं।
फोटोशॉप से बदली गईं ओएमआर शीट्स
जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि ओएमआर शीट्स की स्कैनिंग और डेटा प्रोसेसिंग का कार्य दिल्ली की एक आउटसोर्स फर्म राभव लिमिटेड को दिया गया था। इस फर्म के कर्मचारियों ने बोर्ड के तकनीकी अधिकारियों के साथ मिलकर डिजिटल डेटा में बदलाव किया। कई मामलों में ओएमआर शीट की स्कैन कॉपी में फोटोशॉप के जरिए सही उत्तर भर दिए गए, जिससे अभ्यर्थियों के वास्तविक अंक कई गुना बढ़ गए और वे मेरिट सूची में आ गए।
रिश्तेदारों को लाभ और जांच को दबाने की कोशिश
इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड बोर्ड का तकनीकी प्रमुख संजय माथुर बताया जा रहा है। उसने न केवल अपने पद का दुरुपयोग किया, बल्कि अपनी एक रिश्तेदार पूनम माथुर को लाभ पहुँचाने के लिए उसके 63 अंकों को बढ़ाकर 185 कर दिया। हालांकि, वह अंतिम रूप से चयनित नहीं हो सकी। हद तो तब हो गई जब फर्जीवाड़ा सामने आने पर बोर्ड ने जो प्रशासनिक जांच समिति बनाई, उसमें भी संजय माथुर और उसके सहयोगी प्रवीण गंगवाल को ही सदस्य बना दिया गया, ताकि साक्ष्यों को मिटाया जा सके।
डीआइजी परिस देशमुख ने बताया कि संजय माथुर चयन बोर्ड के गठन के समय से ही वहां तैनात था। एसओजी अब उसके कार्यकाल के दौरान हुई अन्य सभी भर्तियों की भी बारीकी से जांच कर रही है ताकि भ्रष्टाचार की जड़ों तक पहुँचा जा सके। इस खुलासे के बाद प्रदेश के बेरोजगार युवाओं में भारी आक्रोश देखा जा रहा है और उन्होंने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
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