सिरोही में मंत्री की बेरुखी: दोनों पांवो से दिव्यांग मुकेश मंत्री के कदमों में बैठा रहा लेकिन किसी का मन नहीं पसीजा

दोनों पांवो से दिव्यांग मुकेश मंत्री के कदमों में बैठा रहा लेकिन किसी का मन नहीं पसीजा
मंत्री की अनदेखी से दिव्यांग मुकेश परेशान
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Highlights

  • सिरोही के नई धनारी गांव के दिव्यांग मुकेश को मंत्री से मिलने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा।
  • सर्किट हाउस में मंत्री ओटाराम देवासी के पास फरियाद लेकर पहुंचे दिव्यांग को अंदर नहीं जाने दिया गया।
  • बिना पैरों के रेंगकर चलने वाले मुकेश को बैठने तक के लिए जगह नहीं दी गई।
  • यह पहली बार नहीं है जब मंत्री के दरबार से किसी दिव्यांग को ऐसी बेरुखी का सामना करना पड़ा हो।

सिरोही | अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति का कल्याण करने का जहां एक तरफ सरकार दावा कर रही हैं वहीं दूसरी तरफ इन सरकारी दावों के बीच दिव्यांगों को बिना पैरो के यहां से वहां दौड़ करवाने की एक झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई हैं।

सिरोही जिले के नई धनारी गांव के दिव्यांग मुकेश थिंगोर दोनों पांवो से दिव्यांग हैं। जोखिम भरी राहो में दिव्यांग मुकेश बमुश्किल रेंगते हुए चलते है। ऐसे में अब इस दिव्यांगता के साथ साथ मंत्री की अनदेखी का भी दंश झेलने को मजबूर हैं।

दरअसल शुक्रवार को नई धनारी गांव निवासी दिव्यांग मुकेश थिंगोर को राज्यमंत्री ओटाराम देवासी के सर्किट हाउस आने की जानकारी मिली।ऐसे में दिव्यांग मुकेश भी अपनी फरियाद लेकर सिरोही के सर्किट हाउस पहुंच गए। मुकेश ने वहां मंत्री का काफी देर तक इंतजार किया लेकिन मंत्री नहीं आए। काफी इंतजार के बाद दिव्यांग मुकेश को जानकारी मिली की दोपहर में जिला सभागार में अधिकारियों की बैठक लेने के लिए आएंगे।
उसके बाद मंत्री को अपनी फरियाद सुनाने और उसके समाधान की आस लेकर जिला सभागार पहुंच गया।

समाधान के लिए आए और तकलीफ लिए ही लौट गए मुकेश

दोनों पांवो से दिव्यांग, चलने फिरने में असमर्थ दिव्यांग मुकेश मंत्री ओटाराम देवासी से अपनी फरियाद और समाधान के लिए पहले तो सर्किट हाउस के बाहर और फिर जिला सभागार स्थित करीब चार से पांच घंटो तक इंतजार करते रहे लेकिन मंत्री के बेरहम सिस्टम को उसकी लाचारी नजर नहीं आई। हद तो तब हुई जब उसे अंदर जाने देना तो दूर बल्कि उसे बैठने तक नहीं दिया गया। यह घटना प्रदेश में भाजपा सरकार के गरीबो, जरूरतमंदो और निशक्तो के प्रति उदासीन रवैये को दर्शाती हैं। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता का इस मसले पर कहना हैं की यह घटना उस व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है जहां जनता के प्रतिनिधि उनकी सेवा करने के बजाय उनकी पीड़ा का मजाक बना रहे हैं। मंत्री की जनसुनवाई में अपनी समस्या सुनाने समेत समाधान की उम्मीद लेकर गए मुकेश आख़िरकार शाम होने और बढ़ती ठंड देखकर मन मसोस कर वहां से रवाना हो गए।

संवेदनहीनता की पराकाष्ठा-

जिला सभागार में जैसे ही राज्यमन्त्री ओटाराम देवासी पहुंचे वैसे ही दिव्यांग मुकेश उनके कदमों में बैठ उनको फरियाद सुनाने चाह रहे थे लेकिन मंत्री उसे अनदेखा और अनसुना कर अधिकारियों की बैठक लेने के लिए सभागार में चले गए।
सभागार के बाहर इस दृश्य को देखकर लगता हैं या तो मंत्री सत्ता के नशे में चूर हैं या फिर पूरी तरह से संवेदनहिन हो चुके हैं।इतना ही नहीं मंत्री के अलावा वहां मौजूद किसी का भी दिल नहीं पसीजा।

मंत्री की दिव्यांगों के प्रति बेरुखी का यह पहला मामला नहीं-

प्रदेश के मुखिया भजनलाल शर्मा भले ही दिव्यांगजनो के सम्मान की बात करते हो लेकिन उनके ही मंत्री ओटाराम देवासी को इससे कोई सरोकार नहीं हैं।दिव्यांगों के संघर्षो की गूंज मंत्री ओटाराम देवासी को सुनाई नहीं देती हैं यही कारण हैं एक के बाद एक दिव्यांग जन का अपमान करने से नहीं मंत्री चूकते नहीं है।
दिव्यांग मुकेश से पहले 7 जून 2025 को भी इसी तरह दिव्यांग धन्नाराम भी मंत्री की इसी बेरुखी और अनदेखी का शिकार हुआ था। एक के बाद एक दिव्यांग की सुनवाई नहीं होने से जहां एक तरफ दिव्यांगों की जिंदगी ठहर सी गई हैं वहीं दूसरी तरफ मंत्री हैं जो दिव्यांगों के प्रति संवेदनशील होने का नाम नहीं ले रहे है।

केवल प्रेस नोट में ही हो रही जनसुनवाई-

प्रदेश के मुखिया गुड़ गर्वर्नेन्स देने के लिए मंत्रियों को जनसुनवाई कर समस्या समाधान का निर्देश दे रहे हैं लेकिन धरातल पर यह जनसुनवाई कितनी सफल हो रही हैं इसका उदाहरण सभी के सामने है।जनसुनवाई का उद्देश्य गरीबो,दुखियो और निशक्तो की समस्याओं का निराकरण का हैं ताकि उन्हें अपने काम के लिए सरकारी दफ्तरो के चक्कर नहीं कांटने पड़े लेकिन इसके उलट जनसुनवाई में निशक्त फरियादियों को अपनी फरियाद बताने के लिए अंदर तक घुसने नहीं दिया जा रहा हैं।ऐसे में फरियाद पूरा होने और उनके निराकरण होने का तो सवाल ही नहीं उठता है।रोजाना मंत्री की ओर से प्रेस नोट जरूर जारी होता हैं जिसमे यह हवाला दिया जाता हैं मंत्री जनसुनवाई करेंगे और फिर शाम को मुण्डारा के लिए रवाना होंगे।

महज नाम बदलने से नहीं नियत भी बदलनी होगी-

वर्ष 2015 में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से विकलांग की बजाय दिव्यांग शब्द अपनाने की पहल की गई। नाम तो बदल गया लेकिन नजरिया नहीं बदला गया।
फिर भी दिव्यांगों के भीतर का जज्बा हैं कि सब कुछ झेलते हुए आगे का सफर तय करने में पीछे नहीं हटते हैं।हमनें पहले भी बहुत कुछ झेला हैं अब भी झेल रहे हैं। हमारे कदमो में जान हो या ना हो लेकिन जान फूंक देने की हिम्मत जरूरत रखते हैं।सरकारी मशीनरी तो अफसर केवल दिखावा करते हैं।

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