लिटरेचर फेस्टिवल में विश्वनाथन आनंद: जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में बोले विश्वनाथन आनंद, बताया क्यों जरूरी है हाथ से लिखना और मां से हारने का सुख

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में बोले विश्वनाथन आनंद, बताया क्यों जरूरी है हाथ से लिखना और मां से हारने का सुख
विश्वनाथन आनंद
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Highlights

  • विश्वनाथन आनंद ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में एआई और मानवीय संवेदनाओं पर चर्चा की।
  • उन्होंने अपनी मां के साथ ताश खेलने और उनसे हारने को अपनी सबसे बड़ी खुशी बताया।
  • याददाश्त को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने डिजिटल गैजेट्स के बजाय हाथ से लिखने की सलाह दी।
  • शतरंज के खेल में भावनाओं पर काबू पाने और प्रयोग करने को सफलता का मूल मंत्र बताया।

जयपुर | गुलाबी नगरी में आयोजित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के मंच पर शतरंज के जादूगर और पांच बार के विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई। इस साहित्यकुंभ के दौरान उन्होंने केवल शतरंज की चालों पर ही नहीं बल्कि एआई और मानवीय भावनाओं जैसे जटिल विषयों पर भी विस्तार से चर्चा की।

साहित्य के इस महामंच पर आनंद ने बहुत ही साफगोई और सधे हुए अंदाज में अपनी राय रखी। उन्होंने खेल के मैदान से इतर जीवन के दर्शन और पारिवारिक रिश्तों के महत्व को दर्शकों के सामने पेश किया।

मां के साथ अनोखा रिश्ता और खुशियां

जब आनंद से उनकी सबसे बड़ी खुशी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बहुत ही सादगी भरा और दिल को छू लेने वाला जवाब दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि खुशियों की कोई निश्चित रैंकिंग नहीं की जा सकती क्योंकि हर उपलब्धि का अपना स्थान होता है।

उन्होंने एक बेहद भावुक बात साझा करते हुए बताया कि वह आज भी अपनी मां के साथ ताश का खेल खेलते हैं। उन्होंने कहा कि मुझे अपनी मां से हारने में बहुत खुशी मिलती है क्योंकि वह हार मुझे मानसिक सुकून देती है।

याददाश्त के लिए कलम उठाना है जरूरी

आज के डिजिटल दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव पर आनंद ने इसे डिपेंडेंट गैजेट्स की संज्ञा दी। उन्होंने कहा कि लोग अब हर छोटे काम के लिए मशीनों पर निर्भर हो गए हैं जो मानसिक विकास के लिए सही नहीं है।

शतरंज चैंपियन ने सलाह दी कि गैजेट्स पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय हमें जरूरी चीजों को हाथ से लिखना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि जब हम कलम का उपयोग करते हैं तो हमारा दिमाग उस जानकारी को बेहतर तरीके से सहेजने में मदद करता है।

शतरंज की बिसात और भावनाओं पर नियंत्रण

गैजेट्स की चर्चा के बाद आनंद ने शतरंज की बिसात से जुड़े अपने कई दिलचस्प अनुभवों और संघर्षों को साझा किया। उन्होंने बताया कि खेल के दौरान हार मिलने पर गुस्सा आना एक स्वाभाविक मानवीय प्रक्रिया है जिसे नकारा नहीं जा सकता।

आनंद के अनुसार शतरंज का असली मास्टर वही है जो कठिन समय में अपनी भावनाओं पर पूरी तरह काबू पा सके। उन्होंने कहा कि प्रतिद्वंदी को नापसंद करने के बजाय अपनी अगली चाल पर ध्यान केंद्रित करना ही जीत की असली कुंजी है।

प्रयोग करने की शक्ति और सफलता

अपने करियर के महत्वपूर्ण पलों को याद करते हुए उन्होंने साल 2007 के ग्रैंड स्लैम की ऐतिहासिक जीत का विशेष जिक्र किया। इस जीत ने उन्हें यह महत्वपूर्ण पाठ सिखाया कि जीवन और खेल दोनों में निरंतर प्रयोग करना हमेशा बेहतर होता है।

उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि नई चीजों और नई रणनीतियों को आजमाने से ही हम अपनी सीमाओं को पार कर सकते हैं। जयपुर के इस मंच पर आनंद की बातों ने वहां मौजूद हजारों साहित्य और खेल प्रेमियों को गहराई से प्रभावित किया।

यह सत्र न केवल शतरंज प्रेमियों के लिए बल्कि उन सभी के लिए प्रेरणादायक रहा जो जीवन में संतुलन बनाना चाहते हैं। आनंद ने अंत में कहा कि तकनीक का उपयोग करें लेकिन अपनी मानवीय क्षमताओं और याददाश्त को कभी कमजोर न होने दें।

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