Highlights
- रहमान डकैत की पहुंच पुलिस, सेना और राष्ट्रपति तक थी।
- उसने 13 साल की उम्र में अपराध शुरू किया और 79 वारदातों में शामिल था।
- रहमान ने अपनी मां की हत्या की और ल्यारी गैंगवॉर का सूत्रधार बना।
- उसकी मौत एक पुलिस मुठभेड़ में हुई, जिसे कई लोग फ़र्ज़ी मानते हैं।
फ़िल्म 'धुरंधर' (Dhurandhar) में अक्षय खन्ना (Akshay Khanna) द्वारा निभाए गए रहमान डकैत (Rahman Dakait) का किरदार कराची (Karachi) के अंडरवर्ल्ड डॉन सरदार अब्दुल रहमान बलोच (Sardar Abdul Rahman Baloch) पर आधारित है। उसकी पहुंच पुलिस, सेना और राष्ट्रपति आसिफ़ ज़रदारी (Asif Zardari) तक थी।
अक्षय खन्ना अभिनीत फ़िल्म 'धुरंधर' में रहमान डकैत का किरदार इन दिनों हर ज़ुबान पर है। यह किरदार कराची के सबसे ख़तरनाक अंडरवर्ल्ड डॉन सरदार अब्दुल रहमान बलोच की असल ज़िंदगी से प्रेरित है।

एक बार आसिफ़ ज़रदारी ने रहमान को हिरासत में लेने वाले पुलिस अधिकारी चौधरी असलम से कहा था, "मारना नहीं…कोई ग़लत काम नहीं करो…एनकाउंटर नहीं करना।" इन शब्दों में ही उस डकैत का रसूख और उसकी राजनीतिक ताक़तों का अक्स दिखाई देता है।
कौन था रहमान डकैत?
रहमान डकैत, जिसका असली नाम सरदार अब्दुल रहमान बलोच था, कराची अंडरवर्ल्ड का एक प्रमुख चेहरा था। उसने शहर के सबसे पिछड़े इलाक़े ल्यारी में अपनी आँखें खोलीं।
ल्यारी गैंग के इस 'क्राइम लॉर्ड' की पहुंच पुलिस और सेना की ख़ुफ़िया संस्थाओं के शीर्ष अधिकारियों तक ही नहीं, बल्कि देश के राष्ट्रपति तक भी रही।
अपराध की दुनिया में पहला कदम
रहमान बलोच का जन्म 1976 में दाद मोहम्मद उर्फ़ दादल के घर हुआ था। उसके पिता और चाचा दोनों ड्रग्स के धंधे से जुड़े थे।
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक़, 13 साल की उम्र में, 6 नवंबर 1989 को, रहमान ने मोहम्मद बख़्श नामक व्यक्ति को छुरा मारकर घायल कर दिया था। एक अधिकारी ने बताया कि यह उसका अपराध की दिशा में पहला क़दम था।
बदले की आग और पहली हत्या
रहमान के चाचा ताज मोहम्मद की हत्या विरोधी गिरोह बाबू डकैत के हाथों हुई थी। यह घटना रहमान के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई, जिसने उसे बदले की आग में झोंक दिया।
पुलिस के अनुसार, 1992 में ड्रग्स के धंधे में रहमान का झगड़ा नदीम अमीन और उसके साथी नन्नू से हुआ। रहमान और आरिफ़ ने नदीम और नन्नू दोनों की गोली मारकर हत्या कर दी, यह रहमान के हाथों हत्या की पहली वारदात थी।
मां की हत्या का क्रूर सच
इस घटना के कुछ ही महीनों बाद, रहमान ने 18 मई 1995 को थाना कलाकोट की सीमा में अपनी मां ख़दीजा बीबी की भी हत्या कर दी। रहमान ने अधिकारियों को बताया कि उसने 'अपनी मां को अपने ही घर में गोली मार दी।'
पुलिस के मुताबिक़, उसे शक़ था कि मां पुलिस की मुख़बिर बन चुकी हैं। यह घटना रहमान की क्रूरता और उसके भीतर के शैतान को दर्शाती है।
राजनीतिक संबंध और साम्राज्य का विस्तार
रहमान बलोच पर मिली तफ़्तीशी रिपोर्ट एक बेहद ख़ुफ़िया सरकारी दस्तावेज़ थी, जो केवल उसके अपराध ही उजागर नहीं करती, बल्कि राजनीति और अपराध के घिनौने गठजोड़ को भी ज़ाहिर करती है।
इस रिपोर्ट में इस बात का ज़िक्र है कि कैसे 13 साल की उम्र से अपराध की शुरुआत करके रहमान बलोच 'अंडरवर्ल्ड डॉन' बना। इस दौरान कैसे उसने बड़े-बड़े नेताओं, जातीय संगठनों और बिज़नेसमैन से संबंध बनाए, एक ऐसा साम्राज्य खड़ा किया जिसकी कल्पना भी मुश्किल थी।
ल्यारी का 'रॉबिन हुड'
सन 2006 तक रहमान कराची और बलूचिस्तान के कई इलाक़ों में 34 दुकानों, 33 घरों, 12 प्लॉट्स और डेढ़ सौ एकड़ खेती की ज़मीन का मालिक बन चुका था। उसने कुछ जायदाद ईरान में भी ख़रीद ली।
वह पीपल्स अमन कमेटी का प्रमुख 'सरदार अब्दुल रहमान बलोच' कहलाने लगा था। उस वक़्त तक ल्यारी के कुछ क्षेत्रों के लिए रहमान रॉबिन हुड जैसा किरदार बनता जा रहा था।
अब वह राजनीतिक तौर पर नाम कमाने वाला काम करने लगा था, जैसे कि स्कूल और दवाख़ाना खोलना।
गिरफ़्तारी और नाटकीय फ़रार
18 जून 2006 को चौधरी असलम के नेतृत्व में ल्यारी टास्क फ़ोर्स ने क्वेटा के सैटलाइट टाउन में रहमान के ख़ुफ़िया अड्डे पर अचानक छापा मार दिया। 'धुरंधर' फ़िल्म में चौधरी असलम का क़िरदार संजय दत्त ने निभाया है।
छापे के दौरान गिरफ़्तारी से बचने के लिए छत से कूद कर भागने की कोशिश में रहमान की टांग टूट गई। घायल रहमान को दबोच लिया गया, मगर यह गिरफ़्तारी कभी सरकारी रिकॉर्ड पर नहीं दिखाई गई।
आसिफ़ ज़रदारी का फ़ोन
रहमान की कहानी बताने वाले नेता ने दावा किया कि चौधरी असलम ने उन्हें ख़ुद बताया था कि जैसे ही उन्होंने रहमान को हिरासत में लिया, तो अचानक उनके ख़ुफ़िया फ़ोन पर एक अजनबी नंबर से कॉल आई। दूसरी तरफ़ आसिफ़ ज़रदारी थे।
ज़रदारी साहब ने चौधरी असलम से कहा कि, "मारना नहीं। कोई ग़लत काम नहीं करो। जो भी मुक़दमे हैं उसको अदालत में पेश करो…एनकाउंटर नहीं करना।"

पुलिस हिरासत से फ़रार
रहमान को पहले कुछ दिन ल्यारी टास्क फ़ोर्स के अधिकारी इंस्पेक्टर नासिर उल हसन के गार्डन पुलिस लाइंस में स्थित घर पर रखा गया। फिर उस समय कलरी के एसएचओ बहाउद्दीन बाबर के मेट्रोविल स्थित निजी आवास पर भेज दिया गया।
रहमान इंस्पेक्टर बाबर के घर से 'नाटकीय ढंग' से फ़रार हो गया। ख़ुफ़िया रिपोर्ट में रहमान के फ़रार होने की तारीख़ 20 अगस्त 2006 दर्ज है।
रहमान ने फ़रार होते ही यह बात मशहूर कर दी कि वह "पैसे देकर छूट गया है," जिससे पुलिस और विशेष रूप से चौधरी असलम उससे नाराज़ हो गए।
सिस्टम की नाराज़गी और अंत
रहमान तीन तरफ़ से घिर चुका था। एक तरफ़ एमक्यूएम 'रंगदारी भत्ते' और राजनीतिक पकड़ से नाराज़ थी। दूसरी तरफ़ पीपल्स पार्टी भी नाराज़ थी।
तीसरी तरफ़, पुलिस अधिकारी के घर से फ़रार होने और यह मशहूर करने पर कि वह पुलिस वाले को पैसे देकर भागा है, सारी पुलिस और विशेष तौर पर चौधरी असलम भी रहमान से नाराज़ थे।
आखिरी सफ़र और मुठभेड़
ख़तरे में घिर जाने का एहसास इतना ज़्यादा था कि अचानक 8 अगस्त 2009 को रहमान ने अपने क़रीबी और भरोसेमंद साथियों को बुलाया और कहा कि फ़िलहाल आना-जाना कम किया जाए।
अगले ही दिन 9 अगस्त 2009 को ख़ुद रहमान ने बलूचिस्तान जाने की कोशिश की, तो चौधरी असलम को उनके मुख़बिर के ज़रिए रहमान के कराची से निकलने की कोशिश का पता चल गया।
रहमान और उसके तीन नज़दीकी साथी अक़ील बलोच, नज़ीर बलोच और औरंगज़ेब बलोच मोटरसाइकिल पर पुराना गोलीमार पहुंचे, जहां से एक गाड़ी में यह सब बलूचिस्तान के इलाक़े मंद की ओर रवाना हुए।
चौधरी असलम और उनकी टीम उस जगह पहुंची, जिसे ज़ीरो पॉइंट कहते हैं और जहां से एक रास्ता ग्वादर कोस्टल हाईवे और दूसरा क्वेटा की ओर जाता है।
पुलिस की टीम वहां खड़ी हुई जहां यह रास्ता अंग्रेज़ी के शब्द वाई (Y) जैसी शक्ल ले लेता है, ताकि रहमान और उसके साथी जिस ओर से भी आएं, उनका सामना पुलिस से हो और यही हुआ। आख़िरकार, एक काली टोयोटा गाड़ी में रहमान और उसके साथी आते दिखाई दिए।
जब गाड़ी रोकी गई, तो रहमान के साथियों ने विरोध भी नहीं किया। पहचान पत्र मांगे जाने पर रहमान ने फ़र्ज़ी पहचान पत्र दिखाया, उस पर उसका नाम शोएब लिखा था।
रहमान को वहां कोस्ट गार्ड की वर्दी में तैनात पुलिस अधिकारियों ने कहा कि आप जाकर अपना पहचान पत्र गाड़ी में बैठे कर्नल साहब को दिखाएं, यह साहब थे चौधरी असलम।
जैसे ही रहमान ने काले शीशे वाली वीवो का दरवाज़ा खोला, तो उसका सामना चौधरी असलम से हो गया। इससे पहले कि भागने का कोई ख़्याल रहमान के दिल में आता, उसके पीछे खड़े पुलिस अधिकारी मलिक आदिल ने उसे अंदर धक्का दिया और ख़ुद भी गाड़ी में सवार हो गए।
नेता के अनुसार, संभावित पुलिस एनकाउंटर की स्थिति में मौत नज़र आने लगी, तो रहमान ने असलम को पेशकश की कि कुछ ले देकर बात बनाई जा सकती है।
लेकिन असलम ने कहा कि, "जब नहीं लिया था, तो इतना बदनाम किया था कि ख़ुफ़िया संस्थाओं की तफ़्तीश भुगतनी पड़ी और अब ले लूं तो क्या करोगे।"
वहां ज़ीरो पॉइंट से उन सब को नेशनल हाईवे स्टील टाउन ले जाया गया और नॉर्दर्न बाईपास से होते हुए यह क़ाफ़िला लिंक रोड पहुंचा और रहमान वहां पुलिस एनकाउंटर में तीनों साथियों समेत मारा गया।
मुठभेड़ पर सवाल और विरासत
कराची पुलिस की सरकारी विज्ञप्ति 10 अगस्त 2009 के सभी अख़बारों में छपी। अंग्रेज़ी अख़बारों 'डॉन' और 'दी नेशन' ने इस सरकारी विज्ञप्ति का हवाला देते हुए बताया कि रहमान डकैत और उनके तीन साथी पुलिस से झड़प में मारे गए।
विज्ञप्ति में कहा गया, "रहमान हत्या और फिरौती के लिए अपहरण के 80 से अधिक वारदातों में वॉन्टेड था।" कराची पुलिस के प्रमुख वसीम अहमद ने भी पत्रकारों को बताया कि उसकी मौत कराची पुलिस की एक बहुत बड़ी कामयाबी है।
इस पुलिस मुठभेड़ को अदालत में चुनौती दी गई। रहमान की विधवा फ़र्ज़ाना ने अपने वकीलों के ज़रिए सिंध हाई कोर्ट में अर्ज़ी दी कि उनके पति को फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मारा गया है।
अदालत में इस पर राज्य के गृह सचिव समेत कराची पुलिस और सिंध पुलिस के प्रमुखों को अदालत में तलब भी किया, मगर रहमान के परिवार के क़रीबी सूत्रों का कहना है कि वह आज तक मुक़दमे का फ़ैसला होने का इंतज़ार कर रहे हैं।
प्रोफ़ेसर तौसीफ़ अहमद का कहना है कि ल्यारी गैंगवॉर के परदे के पीछे की सच्चाई कुछ और थी। "जो मारामारी आपने ल्यारी में देखी, उसका सिरा आपके यहां नहीं मिलेगा। सिरा ढूंढ़ने बलूचिस्तान जाना पड़ेगा।"
प्रोफ़ेसर तौसीफ़ अहमद की राय यह है कि बलूचिस्तान के जातीय आंदोलन को ल्यारी से अलग करने के लिए राज्य और उसकी संस्थाओं ने क्षेत्र में राजनीति से जुर्म की जड़ को ख़त्म करने के बजाय हमेशा यह मौक़ा दिया कि जुर्म सियासत पर हावी रहे।
सरदार अब्दुल रहमान बलोच कहें या रहमान डकैत, मगर एक बात ज़रूर है कि उसका जनाज़ा ल्यारी के इतिहास के बड़े जनाज़ों में से एक था। यह इस बात का प्रमाण था कि अपराध की दुनिया में भी उसका कितना प्रभाव था।
विडंबना यह है कि रहमान डकैत को मार गिराने वाले चौधरी असलम भी इस कहानी का अंत नहीं थे। इसके पांच साल बाद, जनवरी 2014 में चौधरी असलम ख़ुद तालिबान के आत्मघाती दस्ते का शिकार बने।
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