Rajasthan : माउंट आबू में करना हैं अवैध निर्माण तो हैं आपको पूरी छूट

माउंट आबू में करना हैं अवैध निर्माण तो हैं आपको पूरी छूट
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Highlights

क्यूंकि अवैध निर्माण पर कार्रवाई के मूड़ में नहीं है यहां के अफसर...!!!!

-अफसरों की उदासीनता या मिलीभगत की वजह से ही एक के बाद एक हो रहे अवैध निर्माण

-वन क्षेत्र में लगातार बढ़ते मनुष्य दखल से आने वाले समय में होंगी बड़ी समस्या

माउंट आबू/सिरोही। राजस्थान का कश्मीर कहे जाने वाले माउंट आबू में ईको सेंसेटिव जोन को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की पालना करवाने में जिम्मेदार कितने संजीदा हैं इसका अंदाजा तो आपको शीर्षक पढ़ने मात्र से ही हो गया होगा। वैसे कहने को तो यहां केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने माउंट आबू वन्यजीव अभ्यारण्य ईको सेंसेटिव जोन घोषित कर रखा हैं लेकिन यहां जोन के सख्त नियमों की पालना को लेकर जिम्मेदार बिल्कुल गंभीर नहीं हैं। यही कारण हैं कि माउंट आबू में एक के बाद एक अवैध निर्माणो की किलेबंदी होती गई।थिंक 360 ने समय समय पर जिम्मेदारों की उदासीनता की किताब के पन्ने खोले लेकिन इसके बाद भी अफसरों की आंखो से पट्टी खुलने का नाम ही नहीं ले रही।


यहां अधिकारियों को भी सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की पालना करवाने से ज्यादा होटल-रेस्टोरेंट और रिसोर्ट बना रहे प्रभावशाली लोगों की चिंता हैं।

माउंट आबू में यदि आप अवैध निर्माण करना चाहते हैं तो आपको पूरी छूट हैं क्यूंकि यहां के अफसर अभी अवैध निर्माण पर कार्रवाई करने के मूड़ में नहीं है।आपको सुनकर अजीब लग रहा होगा लेकिन हकीकत यही है।गुजरात के एक प्रभवशाली ने इसी छूट का जमकर फायदा उठाया और देखते ही देखते थोड़े ही अंतराल में आलीशान कोठी का निर्माण करवा दिया।अब इसे मिलीभगत कहे या प्रशासनिक सुस्ती जो इनकी नाक के निचे ही  आलीशान कोठी बनकर तैयार हो गई।

भले ही माउंट आबू में पहाड़ो की खूबसूरती बचाए रखने के उद्देश्य से किसी भी प्रकार की ब्लास्टिंग पर रोक लगा रखी हो लेकिन आपको जानकर हैरानी होंगी कि आलीशान कोठी का निर्माण ही ब्लास्टिंग से शुरू हुआ हैं।ऐसे में यहां हर किसी के मन में एक ही सवाल हैं कि आखिर जब निर्माण पर रोक थी तो यह आलीशान कोठी बनकर कैसे तैयार हो गई?और अब बनने के बाद प्रशासन क्या कर रहा हैं??यही सवाल संवाददाता के मन में भी आया। पूरा माउंट आबू शहर ईको सेंसेटिव जोन में आता हैं तो फिर इस प्रभावशाली को निर्माण की स्वीकृति किसने दी? अगर नहीं दी तो फिर निर्माण कार्य क्यों नहीं रुकवाया गया?? इन सारे सवालों के जवाब के लिए माउंट आबू उपखंड अधिकारी डॉ. अंशुप्रिया से दूरभाष पर संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव करना मुनासिब नहीं समझा।उपखंड अधिकारी का इस तरह से सवालों से बचना उनकी कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा हैं।


स्थानियों पर नियम का डंडा और प्रभावशाली के आगे कलम-डायरी अलमारी में बंद-

माउंट आबू शहर में प्रशासन के दोहरे मापदंड सामने आते रहे हैं।
स्थानीय बाशिंदे अपने घर में शौचालय बनाने के लिए भी वर्षो से तरस रहा हैं।सौ में से एकाध ने भी बिना अनुमति निर्माण कार्य शुरू किया भी तो तुरंत प्रशासन की कार्रवाई का डंडा उस पर चल जाता हैं और नोटिस देने के साथ ही निर्माण सामग्री की जब्ती की कार्रवाई कर दी जाती है लेकिन रसूखदार लोग अवैध रूप से आलीशान भवन या फिर होटल-रिसोर्ट भी बनाए तो इनके सामने प्रशासन की कलम डायरी पूरी तरह से अलमारी में बंद ही नजर आती हैं और अगर कही मुद्दा उठता भी हैं तो प्रशासन नोटिस जारी करने का दावा कर इतिश्री कर लेता हैं।प्रशासन के इस दोहरे रवैये को लेकर आमजन के बीच जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं।


एसडीएम की गठित विशेष टीम ने किया अवलोकन लेकिन कार्रवाई का इंतजार-

माउंट आबू उपखंड अधिकारी का पदभार संभालने के बाद ईको सेंसेटिव जोन में लगातार नियम विरुद्ध निर्माण कार्यों की शिकायत मिल रही थी। शुरुआत में इस मामले को लेकर काफी कड़क नजर आने वाली एसडीएम ने अवैध निर्माणो को चिन्हित करने के लिए एक विशेष टीम का गठन किया। इस विशेष टीम राजस्व विभाग,यूआईटी व वन विभाग के अधिकारी शामिल किए गए। उपखंड अधिकारी की ओर से गठित टीम को जोन की सीमा के भीतर संयुक्त निरिक्षण कर बिना रूपांतरण एवं मॉनिटरिंग कमेटी की अनुमति के बिना हुए निर्माण कार्यो को चिन्हित कर रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी लेकिन काफी समय बीतने के बावजूद भी इस निरिक्षण रिपोर्ट को न तो सार्वजनिक किया गया और ना ही अब तक अवैध निर्माणकर्ताओं को नोटिस जारी किए गए।

मजे की बात तो यह हैं जब उपखंड अधिकारी की यह विशेष टीम पूरे माउंट आबू में अवैध निर्माण कार्यों का सर्वे कर रही थी ठीक उसी समय गुजरात के इस प्रभावशाली व्यक्ति की आलीशान कोठी का भी निर्माण कार्य गति पर था लेकिन उपखंड अधिकारी की विशेष टीम को या तो निर्माण कार्य नजर नहीं आया या फिर विशेष टीम इस निर्माण कार्य को देखना ही नहीं चाहती थी अभी यह स्पष्ट होना बाकी हैं।

सूत्रों की माने तो माउंट आबू एसडीएम का पदभार संभालने के बाद अवैध निर्माण पर काफी सख्त नजर आने वाली एसडीएम के बैकफूट पर आने के पीछे का कारण माउंट आबू में सर्वाधिक होटल व रिसोर्ट हैं। सूत्रों की माने तो ज्यादातर होटल व रिसोर्ट बड़े नेताओं के हैं या फिर उनके रिश्तेदारो के हैं। इतना ही नहीं कई होटल संचालक पूर्व नौकरशाह हैं तो कुछ बड़े पदों पर नौकरी कर रहे हैं। यही कारण हैं कि उपखंड अधिकारी ने जिस तत्परता से अवैध निर्माणो को चिन्हित करने के लिए विशेष टीम गठित की थी उस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं करने और कार्रवाई नहीं करने के पीछे भी रसूखदारो का भय बताया जा रहा हैं। सर्वे रिपोर्ट के बाहर नहीं आने के पीछे नेता-अफसरों को ही कारण माना जा रहा हैं।

माउंट आबू ईको सेंसिटिव जोन के बारे में जाने-

भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली पर्वत माला में स्थित माउंट आबू वन्यजीव अभ्यारण्य को वर्ष 1980 में वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित किया गया।

-माउंट आबू वन्यजीव अभ्यारण्य की सीमा के चारों ओर विस्तार के साथ कुल क्षेत्रफल लगभग 326 वर्ग किलोमीटर हैं।

-25 जून 2009 को भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 की धारा 3 की उपधारा (3) के तहत माउंट आबू शहर समेत आसपास के एक दर्जन गांवो को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया गया।

-वर्ष 2011 राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड के अनुसार पर्यावरण मंत्रालय ने ईकोसेंसिटिव जोन की घोषणा के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए।

-अधिसूचना में 16 सितंबर 2011 से लेकर 26 सितंबर 2011 तक जनता से आपत्ति व सुझाव मांगे गए।

-11 नवंबर 2020 को ईको सेंसिटिव जोन के लिए स्थान मानचित्र और सीमाओं का राजपत्र अधिसूचना के साथ पेश किया गया।

-माउंट आबू ईको सेंसिटिव जोन क्षेत्र 47.30 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ हैं जिसमें से 21.41 वर्ग किलोमीटर माउंट आबू नगरपालिका क्षेत्र हैं।


ईको सेंसिटिव जोन में आते हैं यह गांव-

जवाई,ओरिया,अचलगढ़,सालगाँव,आरणा,सनीगांव,गोआगांव, हेटमजी,देलवाड़ा,तोरणा,ढूंढई और माचगांव शामिल हैं।

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