Highlights
- खालिदा जिया बांग्लादेश की पहली और मुस्लिम जगत की दूसरी महिला प्रधानमंत्री थीं।
- उन्होंने 1991 से 1996 और 2001 से 2006 तक दो बार देश की कमान संभाली थी।
- निधन से एक दिन पहले ही नाजुक हालत में उन्होंने चुनावी नामांकन दाखिल किया था।
- खालिदा जिया लंबे समय से लिवर सिरोसिस और किडनी की गंभीर बीमारी से पीड़ित थीं।
ढाका | बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की प्रमुख बेगम खालिदा जिया का आज सुबह 6 बजे निधन हो गया। वह 80 वर्ष की थीं और पिछले 20 दिनों से ढाका के एवरकेयर अस्पताल में वेंटिलेटर पर जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही थीं। उनके निधन की पुष्टि उनके परिवार और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने की है। खालिदा जिया पिछले कई वर्षों से लिवर सिरोसिस, किडनी की बीमारी, मधुमेह, गठिया और आंखों की गंभीर समस्याओं से जूझ रही थीं। उनके निधन से बांग्लादेश की राजनीति में एक विशाल शून्य पैदा हो गया है।
खालिदा जिया का जन्म 15 अगस्त 1945 को ब्रिटिश भारत के जलपाईगुड़ी में हुआ था। उनके पिता इस्कंदर अली मजूमदार एक चाय व्यवसायी थे। 1947 में विभाजन के बाद उनका परिवार पूर्वी बंगाल के दिनाजपुर में बस गया था। 1960 में उन्होंने पाकिस्तान सेना के तत्कालीन कैप्टन जियाउर रहमान से विवाह किया था। विवाह के बाद उन्होंने अपना नाम बदलकर खालिदा जिया रख लिया था। उनके पति बाद में बांग्लादेश के राष्ट्रपति बने और उन्होंने ही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की स्थापना की थी।
राजनीतिक सफर की शुरुआत
खालिदा जिया राजनीति में अपने पति की हत्या के बाद सक्रिय हुईं। 30 मई 1981 को जियाउर रहमान की हत्या के बाद उन्होंने पार्टी की बागडोर संभाली। 1983 में वह बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की उपाध्यक्ष बनीं और 1984 में उन्हें सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने सैन्य तानाशाह हुसैन मोहम्मद इरशाद के शासन के खिलाफ कड़ा संघर्ष किया। उनके अडिग रवैये के कारण उन्हें बांग्लादेश की राजनीति में एक समझौता न करने वाली नेता के रूप में पहचाना जाने लगा।
प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल
1991 के आम चुनावों में भारी जीत के बाद खालिदा जिया बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। उनके पहले कार्यकाल के दौरान देश में संसदीय प्रणाली की वापसी हुई। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव किए और लड़कियों के लिए दसवीं कक्षा तक की शिक्षा मुफ्त कर दी। उनके शासनकाल में प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य बनाया गया। 2001 में वह दोबारा प्रधानमंत्री बनीं और 2006 तक पद पर रहीं। उनके दूसरे कार्यकाल में बांग्लादेश ने आर्थिक विकास की नई ऊंचाइयों को छुआ और विदेशी निवेश में भारी वृद्धि देखी गई।
विवाद और कानूनी चुनौतियां
खालिदा जिया का राजनीतिक जीवन विवादों से भी घिरा रहा। 2006 में सत्ता छोड़ने के बाद उन पर और उनके बेटों पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे। 2018 में उन्हें जिया ऑर्फनेज ट्रस्ट मामले में पांच साल की सजा सुनाई गई जिसे बाद में बढ़ाकर दस साल कर दिया गया। उन्हें जिया चैरिटेबल ट्रस्ट मामले में भी सात साल की सजा मिली थी। इन सजाओं के कारण वह लंबे समय तक जेल में रहीं और बाद में उन्हें मानवीय आधार पर घर में नजरबंद रखा गया। 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया गया था।
अंतिम समय और नामांकन
निधन से ठीक एक दिन पहले सोमवार को खालिदा जिया ने चुनावी नामांकन दाखिल किया था। पार्टी के नेताओं ने बोगुरा-7 सीट से उनका नामांकन पत्र जमा किया था। उस समय उनकी हालत अत्यंत नाजुक थी और वह वेंटिलेटर पर थीं। बोगुरा-7 सीट का पार्टी के लिए विशेष महत्व है क्योंकि यह उनके पति जियाउर रहमान का गृह क्षेत्र रहा है। खालिदा जिया ने पूर्व में तीन बार इसी सीट से बड़े अंतर से जीत हासिल की थी। उनके निधन के बाद अब इस सीट पर पार्टी को नया उम्मीदवार तय करना होगा।
पारिवारिक पृष्ठभूमि
खालिदा जिया के दो बेटे थे। उनके बड़े बेटे तारिक रहमान वर्तमान में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं और लंबे समय तक लंदन में निर्वासन में रहने के बाद हाल ही में स्वदेश लौटे हैं। उनके छोटे बेटे अराफात रहमान कोको का 2015 में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था। खालिदा जिया के भाई-बहन भी राजनीति और समाज सेवा में सक्रिय रहे हैं। उनके निधन पर बांग्लादेश के राष्ट्रपति और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने गहरा शोक व्यक्त किया है।
स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं
2021 से खालिदा जिया की तबीयत लगातार बिगड़ती रही। उन्हें कई बार अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। उनके इलाज के लिए गठित मेडिकल बोर्ड ने बार-बार उन्हें विदेश ले जाकर इलाज कराने की सलाह दी थी। 2025 की शुरुआत में उन्हें विशेष एयर एम्बुलेंस से लंदन भी ले जाया गया था जहां उनका इलाज द लंदन क्लिनिक में हुआ। हालांकि उनकी स्थिति में कोई स्थायी सुधार नहीं हुआ और अंततः बहु-अंग विफलता के कारण उनका निधन हो गया।
विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंध
प्रधानमंत्री के रूप में खालिदा जिया ने भारत, चीन और सऊदी अरब के साथ संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया था। उन्होंने दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने के लिए सार्क को मजबूत करने की दिशा में काम किया। उनकी लुक ईस्ट पॉलिसी के तहत चीन के साथ व्यापारिक संबंध प्रगाढ़ हुए। भारत के साथ भी उन्होंने सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण वार्ताएं की थीं। उनके निधन पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी संवेदनाएं व्यक्त की हैं।
बांग्लादेश के लिए विरासत
खालिदा जिया को बांग्लादेश में लोकतंत्र की बहाली के लिए किए गए उनके संघर्षों के लिए हमेशा याद रखा जाएगा। उन्होंने एक रूढ़िवादी समाज में महिला नेतृत्व की नई मिसाल पेश की। शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए सुधारों का लाभ आज भी बांग्लादेश की युवा पीढ़ी को मिल रहा है। उनके समर्थकों के लिए वह केवल एक नेता नहीं बल्कि एक प्रेरणा स्रोत थीं जिन्होंने कठिन से कठिन समय में भी हार नहीं मानी।
अंतिम संस्कार की योजना
पार्टी सूत्रों के अनुसार खालिदा जिया का पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए ढाका में रखा जाएगा। उनके अंतिम संस्कार में लाखों लोगों के शामिल होने की संभावना है। सरकार ने उनकी सुरक्षा और गरिमा को ध्यान में रखते हुए विशेष इंतजाम किए हैं। उनके बड़े बेटे तारिक रहमान अंतिम संस्कार की रस्मों का नेतृत्व करेंगे। बांग्लादेश ने उनके सम्मान में राजकीय शोक की घोषणा की है और राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा।
राजनीतिक भविष्य पर प्रभाव
खालिदा जिया के निधन के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के सामने नेतृत्व का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। हालांकि तारिक रहमान पार्टी की कमान संभाल रहे हैं लेकिन खालिदा जिया जैसा करिश्माई व्यक्तित्व मिलना मुश्किल है। आने वाले चुनावों में पार्टी को उनकी कमी खलेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनके निधन से उपजी सहानुभूति की लहर पार्टी के पक्ष में जा सकती है लेकिन संगठन को एकजुट रखना एक बड़ी चुनौती होगी।
ऐतिहासिक संदर्भ
खालिदा जिया का जीवन बांग्लादेश के जन्म और विकास के साथ जुड़ा रहा है। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान उन्होंने जो कष्ट सहे और उसके बाद जिस तरह से उन्होंने एक बिखरी हुई पार्टी को खड़ा किया वह अद्भुत है। वह बेनजीर भुट्टो के बाद मुस्लिम दुनिया की दूसरी ऐसी महिला थीं जिन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से प्रधानमंत्री का पद प्राप्त किया। उनका जाना न केवल एक पार्टी की क्षति है बल्कि दक्षिण एशियाई राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत है।
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