thinQ360
🏠 टॉप 🔥 राजनीति 📍 राज्य 📰 लाइफ स्टाइल 🏏 खेल 🎬 मनोरंजन 📰 जालोर 👤 शख्सियत 💻 तकनीक ✍️ Blog ⭐ सफलता की कहानी 🚨 क्राइम 📰 मनचाही ▶️ YouTube
बहते शब्द

नीलू की कविता: चंपा अब क्यों नहीं आती

नीलू शेखावत

बड़े बड़े घूघरों वाली जोड़ों को ठणमणाती वो अपने सिर पर लेकर चलती थी  पूरा का पूरा शॉपिंग मॉल

+Follow us
thinQ360 को गूगल पर फेवरेट बनाएँ
shringar in village by champa
चंपा अब क्यों नहीं आती

उसका हेला जहां तक पहुंचता
निकल आती घरों से सासुएं
झांकने लगती मोखों से कुलवधुएं
दौड़ पड़ती बालिकाएं

जिस किसी घर के आगे खुलता
वो भानुमती का छाबड़ा
उमड़ पड़ता हुजूम
मुहल्ले भर की ललनाओं का

सुई से लेकर सुथन तक
सब होता था उसमें
क्षीण कटि पर बंधेज की चुनड़ी लपेटे
पसीने से भीगी हुई गोरी देह को मटकाती

बड़े बड़े घूघरों वाली जोड़ों को ठणमणाती
वो अपने सिर पर लेकर चलती थी 
पूरा का पूरा शॉपिंग मॉल

रखती थी हर औरत के
तन बदन और कलाई का नाप
उसका आना सबके दिलों को कर देता हरा

वो अपने पीछे छोड़ जाती रंगीन संसार
रंग जो खिलता कहीं केशों में
कहीं कलाइयों में
कहीं नखों पर
कहीं होठों पर
वो हर एक स्त्री को सजाकर जाती
हाथ को रबड़ की तरह  मोड़कर
मूठ्या पहनाने वाली
चंपा अब क्यूं नहीं आती?

—नीलू शेखावत 

शेयर करें: