सिरोही: पंचायतीराज मंत्री ओटाराम देवासी (Otaram Dewasi) अपने क्षेत्र कालंद्री (Kalindri) को नई पंचायत समिति (Panchayat Samiti) नहीं दिलवा पाए। भावरी (Bhavri) व मंडार (Mandar) नई समितियां बनीं, पर कालंद्री सूची से बाहर रही। इस पर सवाल उठ रहे हैं।
मंत्री ओटाराम के क्षेत्र में नहीं चली उनकी: मंत्री ओटाराम के क्षेत्र में कालंद्री नहीं बनी पंचायत समिति
पंचायतीराज मंत्री ओटाराम देवासी (Otaram Dewasi) अपने क्षेत्र कालंद्री (Kalindri) को नई पंचायत समिति (Panchayat Samiti) नहीं दिलवा पाए। भावरी (Bhavri) व मंडार (Mandar) नई समितियां बनीं, पर कालंद्री सूची से बाहर रही। इस पर सवाल उठ रहे हैं।
HIGHLIGHTS
- मंत्री ओटाराम देवासी अपने क्षेत्र कालंद्री को पंचायत समिति नहीं बनवा पाए। भावरी और मंडार को नई पंचायत समितियों का दर्जा मिला। कांग्रेस विधायक मोतीराम कोली ने मंडार को पंचायत समिति दिलवाई। स्थानीय लोगों और भाजपा कार्यकर्ताओं में नाराजगी है।
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पंचायतीराज विभाग द्वारा जारी अधिसूचना में राज्य मंत्री ओटाराम देवासी अपने ही विधानसभा क्षेत्र सिरोही की कालंद्री को नई पंचायत समिति का दर्जा नहीं दिलवा पाए। यह घटना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गई है, क्योंकि मंत्री के गृह क्षेत्र में ही उनकी बात नहीं मानी गई। इसके विपरीत, भावरी और मंडार को नई पंचायत समितियां घोषित कर दिया गया है, जिससे स्थानीय लोगों और भाजपा कार्यकर्ताओं में असंतोष व्याप्त है।
कालंद्री क्यों नहीं बनी पंचायत समिति?
राजनीतिक हलकों में यह सवाल तेजी से घूम रहा है कि आखिरी क्षणों में ऐसा क्या हुआ कि कालंद्री की फाइल आगे नहीं बढ़ पाई। जनसंख्या, भौगोलिक स्थिति और प्रशासनिक आवश्यकताओं के आधार पर कालंद्री एक मजबूत दावेदार था। इसके बावजूद, इसे सूची से बाहर रखा जाना कई तरह के सवालों को जन्म दे रहा है।
अन्य विधायकों की सफलता
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इस मामले में विरोधाभास साफ नजर आता है। जहां पंचायतीराज मंत्री ओटाराम देवासी अपने क्षेत्र में सफल नहीं हो पाए, वहीं रेवदर के कांग्रेस विधायक मोतीराम कोली ने मंडार को पहले नगर पालिका और अब पंचायत समिति दोनों दिलवा दीं। इसी तरह, पिंडवाड़ा विधायक समाराम गरासिया भी अपने क्षेत्र में भावरी को पंचायत समिति बनवाने में कामयाब रहे।
स्थानीय लोगों में नाराजगी
स्थानीय लोगों और भाजपा कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर गहरी नाराजगी है कि मंत्री के अपने ही क्षेत्र में उनकी नहीं चली। वे इस फैसले को मंत्री की राजनीतिक पकड़ की कमजोरी के रूप में देख रहे हैं और इसे लेकर पार्टी के भीतर भी सुगबुगाहट तेज हो गई है।
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