वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई और भारत का इतिहास: वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और भारत का ऐतिहासिक कारनामा: जब नेहरू ने नेपाल के राजा को किया था एयरलिफ्ट

वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और भारत का ऐतिहासिक कारनामा: जब नेहरू ने नेपाल के राजा को किया था एयरलिफ्ट
नेहरू ने नेपाल के राजा को किया था एयरलिफ्ट
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Highlights

  • अमेरिकी डेल्टा फोर्सेज ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लिया।
  • डोनाल्ड ट्रंप ने इस सैन्य कार्रवाई को दूसरे विश्व युद्ध के बाद की सबसे बड़ी घटना बताया।
  • साल 1950 में भारत ने नेपाल के राजा त्रिभुवन को सुरक्षित दिल्ली एयरलिफ्ट किया था।
  • भारत के इस कूटनीतिक कदम से नेपाल में राणा शासन का अंत और लोकतंत्र की शुरुआत हुई।

नई दिल्ली | वेनेजुएला में हाल ही में अमेरिकी डेल्टा फोर्सेज द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लेकर अमेरिका पहुंचा दिया है।

डोनाल्ड ट्रंप ने इस ऑपरेशन की सराहना करते हुए इसे इतिहास की सबसे बड़ी सैन्य उपलब्धि करार दिया। उन्होंने कहा कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद ऐसी क्षमता किसी और देश ने नहीं दिखाई है।

इतिहास में भारत का साहसी कदम

हालांकि ट्रंप के दावे के विपरीत इतिहास के पन्नों में भारत का नाम भी इसी तरह के एक साहसी कारनामे के लिए दर्ज है। साल 1950 में भारत ने नेपाल में एक ऐसा ही ऑपरेशन सफलतापूर्वक पूरा किया था।

उस समय भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू थे और नेपाल में राजा त्रिभुवन शाह का शासन था। शाह को महज 5 साल की उम्र में साल 1911 में ताज पर बैठा दिया गया था।

राजा होने के बावजूद त्रिभुवन के पास असली ताकत नहीं थी और वह राणा परिवार के हाथों की कठपुतली थे। राणा शासन की शुरुआत 1846 में जंग बहादुर राणा ने कोत पर्व के माध्यम से की थी।

राणा शासन का क्रूर इतिहास

जंग बहादुर राणा ने सत्ता हथियाने के बाद शाह राजवंश को केवल नाम का राजा बना दिया था। 20वीं सदी में नेपाल में राणा परिवार का शासन अत्यंत निरंकुश और दमनकारी माना जाता था।

इतिहासकारों के अनुसार राणा परिवार को ब्रिटिश साम्राज्य का भी भरपूर समर्थन हासिल था। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान राणाओं ने गोरखा लड़ाकों को मित्र राष्ट्रों के समर्थन में लड़ने भेजा था।

नेहरू के सामने कूटनीतिक संकट

1947 में भारत की आजादी के बाद प्रधानमंत्री नेहरू के सामने नेपाल को लेकर बड़ी चुनौती थी। वह तय नहीं कर पा रहे थे कि निरंकुश राणाओं का साथ दें या लोकतांत्रिक आंदोलन का।

नेपाल में राणा शासन के खिलाफ जनता की प्रजा परिषद एक बड़ा आंदोलन चला रही थी। फरवरी 1950 में नेपाली प्रधानमंत्री मोहन राणा जब दिल्ली आए तो उन्हें इक्कीस तोपों की सलामी दी गई।

नेहरू ने मोहन राणा के साथ चीन में हुई माओ क्रांति के बाद के सुरक्षा हालात पर विमर्श किया। भारत चाहता था कि नेपाल में स्थिरता रहे लेकिन राणा शासन सुधारों के पक्ष में नहीं था।

भारतीय दूतावास में ऐतिहासिक शरण

6 नवंबर 1950 को राजा त्रिभुवन ने एक साहसी योजना बनाई और शिकार के बहाने महल से निकले। उनके साथ उनके पुत्र महेंद्र और बड़े पोते वीरेंद्र भी मौजूद थे।

राजा का पूरा परिवार काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास के गेट पर पहुंचा और वहां शरण मांग ली। इस घटना ने पूरे नेपाल और भारत सरकार के बीच खलबली मचा दी थी।

राणा प्रधानमंत्री मोहन शमशेर ने क्रोध में आकर 9 नवंबर को तीन वर्षीय ज्ञानेंद्र को राजा घोषित कर दिया। ज्ञानेंद्र उस समय महल में ही छूट गए थे और राणाओं के कब्जे में थे।

भारत का साहसी एयरलिफ्ट मिशन

भारत सरकार ने 10 नवंबर 1950 को एक ऐतिहासिक सैन्य और कूटनीतिक कदम उठाने का फैसला किया। दो भारतीय विशेष विमानों को काठमांडू भेजा गया ताकि राजा को सुरक्षित लाया जा सके।

भारतीय विमानों ने राजा त्रिभुवन और उनके परिवार को सफलतापूर्वक नई दिल्ली के लिए एयरलिफ्ट किया। यह उस समय का सबसे बड़ा और जोखिम भरा कूटनीतिक रेस्क्यू मिशन माना जाता था।

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली हवाई अड्डे पर स्वयं राजा त्रिभुवन का स्वागत किया। भारत ने राणाओं द्वारा घोषित नए राजा ज्ञानेंद्र को वैध मानने से साफ इनकार कर दिया।

नेपाल में जनक्रांति और समझौता

भारत के इस कदम से नेपाल में राणा परिवार पर भारी अंतरराष्ट्रीय और कूटनीतिक दबाव बन गया। इसके तुरंत बाद पूरे नेपाल में राणा शासन के खिलाफ जनक्रांति भड़क उठी।

नेपाली कांग्रेस की मुक्ति सेना ने राणाओं की सेना के साथ कई मोर्चों पर कड़ा संघर्ष किया। महिलाओं और युवाओं ने सड़कों पर उतरकर लोकतंत्र और राजा की वापसी की मांग की।

आखिरकार भारत की मध्यस्थता में ऐतिहासिक दिल्ली समझौता हुआ और राणाओं को झुकना पड़ा। 15 फरवरी 1951 को राजा त्रिभुवन अपने परिवार के साथ सम्मानपूर्वक काठमांडू वापस लौटे।

हवाई अड्डे से दरबार तक लाखों लोग जश्न मनाते हुए सड़कों पर उमड़ पड़े थे। 18 फरवरी 1951 को नारायणहिटी दरबार में राजा की ताजपोशी हुई और संवैधानिक राजतंत्र की शुरुआत हुई।

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