Highlights
- भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील की पूरी रूपरेखा तैयार हो चुकी थी।
- अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने डील रुकने की वजह का खुलासा किया।
- पीएम मोदी द्वारा डोनाल्ड ट्रंप को फोन न करने की वजह से डील फाइनल नहीं हुई।
- एग्रीकल्चर और डेयरी जैसे मुद्दों पर भी दोनों देशों के बीच पेच फंसा हुआ है।
ट्रेड डील पर बड़ा खुलासा
नई दिल्ली | भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से प्रतीक्षित ट्रेड डील को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने बताया है कि यह डील किसी नीतिगत मतभेद की वजह से नहीं रुकी है।
लुटनिक के अनुसार इस डील की पूरी रूपरेखा पहले ही तैयार कर ली गई थी। इसे अंतिम रूप देने के लिए केवल एक औपचारिक बातचीत की आवश्यकता थी जो नहीं हो सकी।
पीएम मोदी का एक फैसला
वाणिज्य मंत्री ने बताया कि इस महत्वपूर्ण डील को फाइनल करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केवल डोनाल्ड ट्रंप को फोन करना था। हालांकि भारत सरकार इस कदम के लिए उस समय पूरी तरह सहज महसूस नहीं कर रही थी।
प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप को फोन नहीं किया और इसी वजह से दोनों देशों के बीच यह समझौता धरातल पर नहीं उतर सका। लुटनिक ने इस पूरे घटनाक्रम को एक पॉडकास्ट इंटरव्यू के दौरान विस्तार से साझा किया है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस डील को तैयार करने में उन्होंने खुद बहुत मेहनत की थी। यह समझौता दोनों देशों की अर्थव्यवस्था के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता था।
विवादित मुद्दे और चुनौतियां
भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील में एग्रीकल्चर और डेयरी जैसे क्षेत्र हमेशा से ही काफी संवेदनशील रहे हैं। पीएम मोदी ने कई बार स्पष्ट किया है कि वह भारतीय किसानों के हितों के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे।
इसके अलावा रूस से भारत द्वारा कच्चे तेल की खरीद भी एक बड़ा कूटनीतिक मुद्दा बनी हुई है। अमेरिका चाहता है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस पर निर्भरता कम करे।
हालांकि डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में दावा किया था कि भारत ने रूस से तेल खरीदना कम कर दिया है। यह बयान दोनों देशों के बीच बेहतर होते रिश्तों की ओर संकेत देता है।
भविष्य की संभावनाएं
डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद से एक बार फिर ट्रेड डील की चर्चाएं काफी तेज हो गई हैं। दोनों देश आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए लगातार उच्च स्तरीय बातचीत कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों नेता आपसी सहमति बना लेते हैं तो यह वैश्विक व्यापार के लिए एक ऐतिहासिक कदम होगा। फिलहाल दुनिया की नजरें इन दोनों लोकतांत्रिक महाशक्तियों के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या दोनों देश अपने पुराने मतभेदों को भुलाकर नए समझौते पर हस्ताक्षर करते हैं। भारत अपनी व्यापारिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए अमेरिका के साथ साझेदारी बढ़ाना चाहता है।
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