Highlights
- हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि गरीबी कोई गुनाह नहीं है और आर्थिक स्थिति देखकर बॉन्ड तय होना चाहिए।
- कोर्ट ने कैदी खरताराम की चिट्ठी को ही रिट याचिका मानकर पैरोल पर रिहा करने का आदेश दिया।
- प्रदेश के सभी अधिकारियों के लिए पैरोल को लेकर नई छह सूत्रीय गाइडलाइन जारी की गई है।
- अब गरीब कैदियों को बिना जमानती के केवल निजी मुचलके पर भी पैरोल मिल सकेगी।
जोधपुर | राजस्थान हाईकोर्ट ने एक कैदी द्वारा जेल से भेजी गई चिट्ठी पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इस चिट्ठी को जनहित याचिका मानते हुए गरीब कैदियों के लिए पैरोल के नियमों में बड़े बदलाव किए हैं।
जोधपुर मुख्यपीठ ने स्पष्ट किया है कि गरीबी किसी भी व्यक्ति के लिए सजा का कारण नहीं बननी चाहिए। कोर्ट ने पैरोल पर रिहाई के लिए गरीब कैदियों से भारी भरकम जमानती मांगने के अधिकारियों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस फरजंद अली की खंडपीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में भविष्य के लिए नई गाइडलाइन जारी की है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी कैदी की आर्थिक स्थिति देखकर ही उसके बॉन्ड की शर्त तय की जानी चाहिए।
खरताराम का मामला और कोर्ट का हस्तक्षेप
यह पूरा मामला सेंट्रल जेल जोधपुर में आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदी खरताराम से जुड़ा है। खरताराम ने जेल से ही एक पोस्टकार्ड के जरिए हाईकोर्ट को अपनी व्यथा सुनाई थी।
कोर्ट ने खरताराम की इस चिट्ठी को ही रिट याचिका के रूप में स्वीकार किया और सुनवाई शुरू की। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि खरताराम हत्या के एक मामले में साल 2014 से उम्रकैद की सजा काट रहा है।
सितंबर 2025 में जिला पैरोल कमेटी ने उसे चौथी बार 40 दिन के नियमित पैरोल पर रिहा करने का आदेश दिया था। लेकिन कमेटी ने उसकी रिहाई के लिए 25 हजार रुपये के दो जमानती पेश करने की शर्त लगा दी थी।
गरीबी के कारण रिहाई में आई बाधा
खरताराम की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि वह इन शर्तों को पूरा करने में पूरी तरह असमर्थ था। उसके पास वकील करने के लिए भी पैसे नहीं थे इसलिए उसने सीधे कोर्ट को पत्र लिखा था।
कोर्ट ने दस्तावेजों की जांच की तो सामने आया कि यह चौथा मौका था जब इस कैदी को जमानती न दे पाने के कारण कोर्ट आना पड़ा। इससे पहले भी वह इसी वजह से पैरोल का लाभ नहीं ले पा रहा था।
साल 2019, 2020 और 2022 में भी उसे पैरोल मिला था लेकिन तब भी अधिकारियों ने ऐसी ही शर्तें थोपी थीं। पिछली तीन बार भी हाईकोर्ट ने दखल देकर उसे निजी मुचलके पर रिहा करने का आदेश दिया था।
सिस्टम की उदासीनता पर कोर्ट के कड़े तेवर
कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा कि यह एक बहुत ही परेशान करने वाला पैटर्न बन गया है। कैदी को अपनी गरीबी के कारण बार-बार कोर्ट के दरवाजे खटखटाने पड़ रहे हैं जो सिस्टम की बेपरवाही को दिखाता है।
जस्टिस मोंगा ने टिप्पणी की कि पैरोल एक सुधारात्मक अधिकार है और इसे अमीरों का विशेषाधिकार नहीं बनाया जा सकता। गरीब कैदी से जमानती मांगना उसे पैरोल देने से मना करने जैसा ही है।
कोर्ट ने जिला पैरोल कमेटी के पुराने आदेश को रद्द करते हुए खरताराम को 50 हजार रुपये के निजी मुचलके पर रिहा करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही पूरे राजस्थान के लिए 6 सूत्रीय गाइडलाइन जारी की।
नई 6 सूत्रीय गाइडलाइन का विवरण
पहली गाइडलाइन के अनुसार पैरोल मंजूर करते समय पर्सनल बॉन्ड की राशि कैदी की आर्थिक हैसियत के हिसाब से होनी चाहिए। यह राशि इतनी ज्यादा नहीं होनी चाहिए कि कैदी के लिए वह दमनकारी बन जाए।
दूसरी गाइडलाइन में कहा गया है कि पहली नियमित पैरोल के समय ही अगर कमेटी को पता चले कि कैदी गरीब है तो उसे जमानती की शर्त नहीं लगानी चाहिए। अधिकारियों को अपने विवेक का इस्तेमाल करना होगा।
तीसरी शर्त के मुताबिक अगर पहली बार में जमानती की शर्त लग गई है और कैदी उसे हटाने का आवेदन करता है तो उसे तुरंत हटाना चाहिए। गरीबी की पुष्टि होने पर कैदी को राहत देना अनिवार्य होगा।
भविष्य के लिए सुरक्षात्मक उपाय
चौथी गाइडलाइन स्पष्ट करती है कि यदि कोई कैदी पहले बिना जमानती के छोड़ा गया है तो अगली बार उससे जमानती नहीं मांगे जाने चाहिए। जब तक उसकी आर्थिक स्थिति सुधरने का कोई प्रमाण न हो तब तक पुरानी राहत जारी रहेगी।
पांचवीं गाइडलाइन उन विशेष मामलों पर भी लागू होगी जिनमें सरकार मानवीय आधार पर पैरोल देती है। नियमों के तहत पात्र न होने पर भी अगर पैरोल मिल रही है तो वहां भी गरीबी का ध्यान रखा जाएगा।
छठी और अंतिम गाइडलाइन के तहत राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को ऐसे कैदियों का डेटाबेस बनाने का निर्देश दिया गया है। जब भी किसी कैदी को जमानती से छूट मिले तो इसकी सूचना तुरंत प्राधिकरण को दी जानी चाहिए।
विधिक सेवा प्राधिकरण की भूमिका
कोर्ट ने निर्देश दिया है कि राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण इन मामलों की निगरानी करेगा। इससे भविष्य में गरीब कैदियों को अपने आप कानूनी मदद मिल सकेगी और उन्हें बार-बार परेशान नहीं होना पड़ेगा।
इस फैसले से राजस्थान की जेलों में बंद उन सैकड़ों कैदियों को लाभ मिलेगा जो सिर्फ पैसों के अभाव में बाहर नहीं आ पाते। कोर्ट ने माना कि न्याय की प्रक्रिया में आर्थिक स्थिति कभी भी बाधा नहीं बननी चाहिए।
6 जनवरी 2026 को सुनाया गया यह फैसला जेल सुधारों की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। अब जेल प्रशासन और पैरोल कमेटियों को अपनी कार्यप्रणाली में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना होगा।
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